मध्यप्रदेश TET विवाद: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा संकेत, बिना TET नियुक्ति नहीं
मध्यप्रदेश में शिक्षक बनने का सपना देख रहे अभ्यर्थियों और पहले से कार्यरत शिक्षकों के लिए सुप्रीम कोर्ट से एक बड़ा और निर्णायक संदेश सामने आया है। बुधवार को इस महत्वपूर्ण मामले पर सुप्रीम कोर्ट में एक अहम सुनवाई हुई, जिसमें अदालत ने अपने रुख से भावी दिशा स्पष्ट कर दी है। सुनवाई के दौरान
मध्यप्रदेश में शिक्षक बनने का सपना देख रहे अभ्यर्थियों और पहले से कार्यरत शिक्षकों के लिए सुप्रीम कोर्ट से एक बड़ा और निर्णायक संदेश सामने आया है। बुधवार को इस महत्वपूर्ण मामले पर सुप्रीम कोर्ट में एक अहम सुनवाई हुई, जिसमें अदालत ने अपने रुख से भावी दिशा स्पष्ट कर दी है। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ संकेत दिए हैं कि अब बिना शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) पास किए किसी भी शिक्षक की नियुक्ति संभव नहीं होगी, जो इस क्षेत्र में कार्यरत और इच्छुक दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत है।
अदालत ने अपनी टिप्पणी में यह भी साफ किया कि पात्रता परीक्षा से संबंधित जो भी विशेष राहत या छूट पहले प्रदान की जानी थी, वह अवधि पहले ही समाप्त हो चुकी है और अब इस संबंध में कोई नई रियायत संभव नहीं है। यह बयान उन सभी पुनर्विचार याचिकाओं के संदर्भ में आया है, जो मध्यप्रदेश सरकार के साथ-साथ प्रदेश और देशभर के कई शिक्षक संगठनों की ओर से दायर की गई थीं। इन याचिकाओं में मुख्य रूप से वर्ष 1998 से 2009 के बीच नियुक्त हुए शिक्षकों को TET परीक्षा से छूट देने की मांग उठाई गई थी, जिससे उन्हें अपनी नौकरी जारी रखने में सुविधा मिल सके।
NCTE के नियमों का पालन करना अनिवार्य
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि वर्ष 2017 में नियम लागू होने के बाद शिक्षकों को पहले ही पांच साल तक की छूट दी जा चुकी है। अब राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) द्वारा तय किए गए नियमों का पालन सभी राज्यों और शिक्षकों को अनिवार्य रूप से करना होगा। अदालत ने इस बात को भी स्पष्ट रूप से रेखांकित किया कि शिक्षक बनने के लिए निर्धारित न्यूनतम पात्रता मानकों से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह शिक्षा की गुणवत्ता और छात्रों के भविष्य से जुड़ा एक गंभीर विषय है।
अदालत का अंतिम फैसला आना अभी शेष
हालांकि, इस मामले में अंतिम फैसला अभी तक नहीं आया है। बुधवार शाम तक 70 से भी अधिक याचिकाओं पर सुनवाई जारी रही, जिसमें विभिन्न पक्षों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं और रिटायर्ड जजों ने अपनी-अपनी दलीलें पेश कीं। लेकिन, सुनवाई के दौरान कोर्ट का जो रुख सामने आया, वह शिक्षकों के पक्ष में बहुत अधिक सकारात्मक नजर नहीं आया, जिससे याचिकाकर्ताओं में थोड़ी निराशा भी देखने को मिली।
शिक्षक संघ ने कोर्ट के रुख पर जताई नाखुशी
जनजातीय कल्याण शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष डीके सिंगौर ने इस संदर्भ में अपनी बात रखी। उन्होंने बताया कि उनके संगठन की ओर से भी इस मामले में याचिका दायर की गई थी। सिंगौर ने कहा कि उन्होंने अदालत के समक्ष मजबूत और ठोस तर्क प्रस्तुत किए थे, इसके बावजूद अदालत का रुख उन्हें राहत देने वाला प्रतीत नहीं हुआ, जिससे उनके संगठन की उम्मीदों को झटका लगा है।
ये है पूरा मामला
दरअसल, यह पूरा विवाद सुप्रीम कोर्ट के 1 सितंबर 2025 के उस आदेश के बाद शुरू हुआ था, जिसमें यह स्पष्ट रूप से कहा गया था कि यदि कोई शिक्षक TET परीक्षा पास नहीं करता है, तो उसकी सेवा समाप्त की जा सकती है। इस आदेश के बाद स्कूल शिक्षा विभाग और लोक शिक्षण संचालनालय ने वर्ष 1998 से 2009 के बीच बिना TET नियुक्त हुए शिक्षकों के लिए पात्रता परीक्षा को अनिवार्य करने के निर्देश जारी किए थे। मध्यप्रदेश में ऐसे शिक्षकों की संख्या लगभग डेढ़ लाख बताई जा रही है, जिन पर इस फैसले का सीधा असर पड़ने वाला है।
इस फैसले के विरोध में विभिन्न शिक्षक संगठनों ने आंदोलन भी किए थे। भोपाल में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन आयोजित हुए और मुख्यमंत्री, स्कूल शिक्षा मंत्री सहित अन्य जनप्रतिनिधियों के माध्यम से केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट से इस आदेश पर पुनर्विचार करने की पुरजोर मांग उठाई गई थी। टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट (TET) एक राष्ट्रीय स्तर की पात्रता परीक्षा है, जिसे राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) ने वर्ष 2010 में अनिवार्य किया था। यह परीक्षा मुख्य रूप से इस बात का निर्धारण करती है कि कोई अभ्यर्थी कक्षा 1 से 8 तक के छात्रों को पढ़ाने के लिए आवश्यक योग्यता रखता है या नहीं।