यहां पेशाब करना मना है: मैसूर में अनूठा प्रयोग, चमकदार ‘मिरर वॉल’ के आगे खुद की परछाई देख ठिठकने लगे लोग

हमारे देश के लगभग हर शहर में कुछ ऐसी दीवारें होती हैं जिनके पास से गुजरते ही लोग नाक पर रूमाल रख लेते हैं। कहीं बस स्टैंड के पीछे, कहीं पुल के नीचे, तो कहीं बाजार की खाली दीवारों के किनारे खुले में पेशाब की समस्या वर्षों से शहरों की बदसूरती और बदबू की बड़ी

May 7, 2026 - 15:30
यहां पेशाब करना मना है: मैसूर में अनूठा प्रयोग, चमकदार ‘मिरर वॉल’ के आगे खुद की परछाई देख ठिठकने लगे लोग

हमारे देश के लगभग हर शहर में कुछ ऐसी दीवारें होती हैं जिनके पास से गुजरते ही लोग नाक पर रूमाल रख लेते हैं। कहीं बस स्टैंड के पीछे, कहीं पुल के नीचे, तो कहीं बाजार की खाली दीवारों के किनारे खुले में पेशाब की समस्या वर्षों से शहरों की बदसूरती और बदबू की बड़ी वजह बनी हुई है। “यहां पेशाब करना मना है” जैसे बोर्ड अक्सर उन्हीं जगहों पर सबसे ज्यादा नजर आते हैं, जहां लोग सबसे ज्यादा नियम तोड़ते हैं।

इस समस्या को सुलझाने के लिए मैसूर में एक अनोखी पहल की गई है। ये शहर जो अपनी साफ-सफाई, विरासत और शांत माहौल के लिए जाना जाता है, अब एक अनोखे प्रयोग को लेकर देशभर में चर्चा में है। यहां खुले में पेशाब की पुरानी समस्या से निपटने के लिए ऐसा तरीका अपनाया गया है जिसने लोगों को चौंका भी दिया है और सोचने पर मजबूर भी कर दिया है।

सार्वजनिक स्थल पर मूत्र विसर्जन से रोकने के लिए अनोखा तरीका

मैसूर में इन दिनों एक दीवार लोगों का ध्यान खींच रही है। यह कोई कलाकृति या पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि शहर को साफ-सुथरा रखने की कोशिश का हिस्सा है। अक्सर सार्वजनिक स्थानों और बस स्टैंड के आसपास दीवारों को लोग खुले में पेशाब के लिए इस्तेमाल कर लेते हैं। चेतावनी बोर्ड, जुर्माने और सफाई अभियानों के बावजूद आदतें नहीं बदल रहीं थीं। ऐसे में मैसूर सिटी कॉर्पोरेशन ने मनोविज्ञान और तकनीक को मिलाकर एक ऐसा प्रयोग किया, जिसकी चर्चा अब सोशल मीडिया से लेकर प्रशासनिक हलकों तक हो रही है।

80 मीटर लंबी दीवार को बनाया ‘रिफ्लेक्टिव वॉल’

मैसूर सेंट्रल बस स्टैंड के पास स्थित करीब 80 मीटर लंबी दीवार पर स्टेनलेस स्टील की चमकदार शीट्स लगाई गई हैं। ये शीट्स किसी बड़े शीशे की तरह दिखाई देती हैं। जैसे ही कोई व्यक्ति दीवार के सामने खड़ा होता है उसकी परछाई साफ दिखाई देने लगती है। इतना ही नहीं, आसपास से गुजर रहे लोग भी उसे आसानी से देख सकते हैं। प्रशासन का मानना है कि “देखे जाने का एहसास” लोगों को खुले में पेशाब करने से रोकने में मदद करेगा।

शर्मिंदगी का मनोवैज्ञानिक असर हो रहा कारगर

नगर निगम अधिकारियों के मुताबिक, कई बार लोग चेतावनी से ज्यादा सामाजिक झिझक से प्रभावित होते हैं। यही सोच इस प्रोजेक्ट की नींव बनी। प्रशासन ने पाया कि सुनसान दीवारें लोगों को खुले में पेशाब के लिए “सुरक्षित जगह” जैसी लगती हैं। लेकिन जब वही दीवार आईने जैसी चमकने लगे और व्यक्ति खुद को दूसरों की नजरों में महसूस करे, तो वह ऐसा करने से बचने लगता है। मनोविज्ञान की भाषा में समझें तो ये तरीका “बिहेवियरल अर्बन डिजाइन” का उदाहरण माना जा सकता है, जिसमें लोगों की आदतें बदलने के लिए सीधे दंड की बजाय वातावरण को बदला जाता है।

रात में भी रहेगा असर, एलईडी लाइट्स से चमकेगी दीवार

इस प्रोजेक्ट को सिर्फ दिन तक सीमित नहीं रखा गया। स्टील पैनलों के चारों ओर एलईडी लाइटें लगाई गई हैं जो शाम होते ही स्ट्रीट लाइट्स के साथ अपने आप जल उठती हैं। इससे रात में भी दीवार चमकती रहती है और अंधेरे का फायदा उठाकर खुले में पेशाब करने की संभावना कम होती है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले इस इलाके से गुजरते समय बदबू और गंदगी की समस्या रहती थी, लेकिन अब वहां काफी बदलाव महसूस हो रहा है। कई यात्रियों ने इसे “स्मार्ट और प्रैक्टिकल आइडिया” बताया है।

सिर्फ दीवार नहीं, सोच बदलने की कोशिश

स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले इस इलाके से गुजरते समय बदबू और गंदगी की समस्या रहती थी, लेकिन अब वहां काफी बदलाव महसूस हो रहा है। कई यात्रियों ने इसे “स्मार्ट और प्रैक्टिकल आइडिया” बताया है। भारत के कई शहरों में सार्वजनिक शौचालयों की कमी और जागरूकता की समस्या लंबे समय से चुनौती बनी हुई है। ऐसे में मैसूर का यह प्रयोग सिर्फ एक चमकदार दीवार नहीं, बल्कि लोगों की आदतों और सार्वजनिक व्यवहार को बदलने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। यदि यह मॉडल सफल रहता है तो आने वाले समय में दूसरे शहर भी इसी तरह के “रिफ्लेक्टिव वॉल” प्रयोग अपनाते दिखाई दे सकते हैं।