वामन जयंती आज: भगवान विष्णु ने क्यों लिया था वामन अवतार, जानिए राजा बलि की कथा

आज वामन जयंती है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व भगवान विष्णु के पांचवें अवतार भगवान वामन के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु ने वामन रूप धारण कर राजा बलि के बढ़ते प्रभाव और दर्प को समाप्त किया […]

Sep 23, 2026 - 10:30
वामन जयंती आज: भगवान विष्णु ने क्यों लिया था वामन अवतार, जानिए राजा बलि की कथा

आज वामन जयंती है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व भगवान विष्णु के पांचवें अवतार भगवान वामन के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु ने वामन रूप धारण कर राजा बलि के बढ़ते प्रभाव और दर्प को समाप्त किया था। इसीलिए इस पर्व को धर्म, दान, वचन पालन और विनम्रता से जोड़कर देखा जाता है।

इस अवसर पर सीएम मोहन यादव ने शुभकामनाएं दी हैं। उन्होंने कहा कि “भगवान श्री विष्णु जी के पांचवें अवतार भगवान वामन जी के प्राकट्य दिवस की समस्त प्रदेशवासियों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं। भक्ति, धर्म एवं दानशीलता के स्वरूप भगवान वामन जी की कृपा से हम सभी के जीवन में सुख, समृद्धि और यश की वृद्धि हो, यही मंगलकामना है।”

वामन जयंती कब मनाई जाती है

हिंदू पंचांग के अनुसार, वामन जयंती भाद्रपद शुक्ल द्वादशी को मनाई जाती है। इस वर्ष द्वादशी तिथि 22 सितंबर की रात लगभग 9 बजकर 43 मिनिट से शुरु हुई है। उदया तिथि के आधार पर वामन जयंती का व्रत और पूजन 23 सितंबर को किया जा रहा है। इस दिन श्रवण नक्षत्र का भी संयोग है।

क्यों मनाई जाती है वामन जयंती

वामन जयंती भगवान विष्णु के वामन अवतार के प्राकट्य की स्मृति में मनाई जाती है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, भाद्रपद शुक्ल द्वादशी को महर्षि कश्यप और माता अदिति के पुत्र के रूप में भगवान विष्णु वामन रूप में प्रकट हुए थे। उनका यह अवतार धर्म की रक्षा के साथ अहंकार के अंत और दान की महत्ता का संदेश देता है। इस दिन श्रद्धालु भगवान विष्णु और वामन स्वरूप की पूजा करते हैं। कई स्थानों पर व्रत, कथा-पाठ और दान-पुण्य भी किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन किए गए दान और पूजा को विशेष महत्व दिया गया है।

राजा बलि से जुड़ी है वामन अवतार की कथा

भगवान वामन की कथा का सबसे महत्वपूर्ण प्रसंग राजा बलि से जुड़ा है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्रह्लाद के पौत्र राजा बलि शक्तिशाली होने के साथ दानवीर भी थे। अपनी शक्ति के बल पर उन्होंने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था। इससे देवताओं के सामने संकट खड़ा हो गया और इंद्र का सिंहासन भी उनके हाथ से चला गया।

देवताओं की स्थिति को देखते हुए माता अदिति ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। इसके बाद भगवान विष्णु ने वामन के रूप में अवतार लिया। उस समय राजा बलि यज्ञ कर रहे थे। वामन उनके पास पहुंचे और दान में केवल तीन पग भूमि मांग ली। बलि ने तीन पग भूमि देने का वचन दे दिया। इसके बाद  भगवान वामन ने विराट रूप धारण कर लिया। उनके पहले पग में पृथ्वी और दूसरे पग में स्वर्ग समा गया। तीसरा पग रखने के लिए कोई स्थान नहीं बचा तो राजा बलि ने अपना सिर भगवान के सामने झुका दिया।

भगवान विष्णु राजा बलि के वचन और समर्पण से प्रसन्न हुए। उन्होंने बलि का वध करने के बजाय उन्हें सुतल लोक का राजा बनाया। साथ ही उन्हें यह वरदान भी दिया कि वे समय-समय पर पृथ्वी पर आ सकेंगे। इस तरह वामन अवतार की कथा में एक ओर भगवान विष्णु द्वारा बलि के दर्प के नाश का प्रसंग आता है तो दूसरी ओर बलि की दानशीलता और वचन निभाने की भावना भी सामने आती है।