आपातकाल के 51 साल: सेंसरशिप, नसबंदी, तुर्कमान गेट और लोकतंत्र की लड़ाई की अनगिनत कहानियां
आज से ठीक 51 साल पहले 25 जून 1975 की मध्यरात्रि को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पूरे देश में आपातकाल घोषित कर दिया था। आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का ऐसा अध्याय है जिसे आज भी राजनीतिक और संवैधानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। 21 मार्च 1977 तक चले इस दौर में देश
आज से ठीक 51 साल पहले 25 जून 1975 की मध्यरात्रि को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पूरे देश में आपातकाल घोषित कर दिया था। आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का ऐसा अध्याय है जिसे आज भी राजनीतिक और संवैधानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। 21 मार्च 1977 तक चले इस दौर में देश ने कई ऐसे घटनाक्रम देखे जिन्होंने राजनीति, न्यायपालिका, मीडिया और नागरिक अधिकारों पर गहरा प्रभाव डाला।
आपातकाल की कहानी सिर्फ सत्ता के दुरुपयोग की नहीं बल्कि साहस, प्रतिरोध और लोकतंत्र की कीमत की भी है। इमरजेंसी से जुड़े कई तथ्य व्यापक रूप से चर्चित रहे हैं। इसके कई ऐसे पहलू हैं जो उस दौर की वास्तविकता और लोकतंत्र पर पड़े प्रभाव को और गहराई से समझने का अवसर देते हैं। आइए जानते हैं भारतीय लोकतंत्र के इस सबसे विवादित कालखंड से जुड़े कुछ प्रसंग।
प्रेस पर सेंसरशिप और साहसी विरोध
आपातकाल की पहली रात दिल्ली के प्रेस एरिया में बिजली काट दी गई ताकि अखबार न छप सकें। सुबह लोग आकाशवाणी से खबर सुनकर स्तब्ध रह गए। इसे लेकर द टाइम्स ऑफ इंडिया ने “Democracy is Dead” जैसी खबर छापी। इंडियन एक्सप्रेस ने संपादकीय कॉलम पूरी तरह खाली छोड़कर मौन विरोध जताया। फाइनेंशियल एक्सप्रेस ने रवींद्रनाथ टैगोर की कविता “जहां मन बिना भय के” छापकर अपना संदेश दिया।
नसबंदी अभियान बना सबसे बड़ा विवाद
आपातकाल के दौरान परिवार नियोजन कार्यक्रम को आक्रामक रूप से लागू किया गया। तत्कालीन सत्ता प्रतिष्ठान में प्रभावशाली भूमिका निभाने वाले संजय गांधी के नाम के साथ इस अभियान का उल्लेख अक्सर किया जाता है। कई राज्यों से जबरन या दबाव में नसबंदी कराए जाने की शिकायतें सामने आईं, जिसके कारण यह कार्यक्रम व्यापक विवाद का विषय बन गया।
तुर्कमान गेट की घटना
दिल्ली में करीब 1.2 लाख झोपड़ियां तोड़ी गईं और लगभग 7 लाख लोग विस्थापित हुए। तुर्कमान गेट (मुस्लिम बहुल इलाका) में विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस फायरिंग में कई लोग मारे गए। अतिक्रमण हटाने और पुनर्वास अभियान के दौरान विरोध प्रदर्शन हुए। पुलिस कार्रवाई और उससे जुड़े घटनाक्रम आज भी आपातकाल के सबसे चर्चित और संवेदनशील प्रसंगों में गिने जाते हैं।
फिल्मों और कलाकारों पर भी पड़ा असर
आपातकाल के दौरान मनोरंजन जगत भी अछूता नहीं रहा। प्रसिद्ध गायक किशोर कुमार ने संजय गांधी के कार्यक्रम में गाने से इनकार कर दिया। परिणाम ये हुआ कि आकाशवाणी और दूरदर्शन पर उनके गाने छह महीने के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया। किशोर कुमार ने कभी माफी नहीं मांगी।वहीं कुछ फिल्मों को सेंसरशिप और प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा जिनमें “किस्सा कुर्सी का” और “आंधी” प्रमुख रूप से चर्चा में रही।
भूमिगत आंदोलन और लोकतंत्र की लड़ाई
आपातकाल के दौरान अनेक राजनीतिक कार्यकर्ता भूमिगत होकर सक्रिय रहे। उस दौरान हजारों विपक्षी नेता और कार्यकर्ता गिरफ्तार किए गए। MISA कानून के तहत एक लाख से अधिक लोग बिना मुकदमे के जेल भेजे गए। विभिन्न राजनीतिक दलों और संगठनों से जुड़े कार्यकर्ताओं ने गुप्त बैठकों, पर्चों और वैकल्पिक संचार माध्यमों के जरिए विरोध जारी रखा। बाद के वर्षों में कई नेताओं ने अपने संस्मरणों में उस दौर के अनुभव साझा किए।
जनादेश ने बदल दी राजनीति
जनवरी 1977 में इंदिरा गांधी ने अचानक चुनाव घोषित कर दिए। मार्च 1977 में हुए चुनाव में जनता पार्टी को जीत मिली और पहली बार केंद्र में गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। इसके बाद 44वें संविधान संशोधन के माध्यम से आपातकाल संबंधी प्रावधानों में महत्वपूर्ण बदलाव किए गए ताकि भविष्य में ऐसी परिस्थितियों में अधिक संवैधानिक नियंत्रण सुनिश्चित किया जा सके।