लोकसभा में सोमवार को देश को नक्सल मुक्त करने के प्रयासों पर अहम चर्चा, श्रीकांत शिंदे करेंगे शुरुआत, गृह मंत्री अमित शाह देंगे जवाब

सोमवार, 30 मार्च को भारतीय संसद की लोकसभा में देश को नक्सलवाद से पूरी तरह मुक्त करने के प्रयासों पर एक गहन चर्चा होगी। यह महत्वपूर्ण बातचीत लोकसभा के नियम 193 के तहत होगी, जो सदन को बिना किसी मतदान के जनहित के तात्कालिक महत्व के मुद्दों पर अल्पकालिक चर्चा की अनुमति देता है। स्पीकर

Mar 29, 2026 - 20:30
लोकसभा में सोमवार को देश को नक्सल मुक्त करने के प्रयासों पर अहम चर्चा, श्रीकांत शिंदे करेंगे शुरुआत, गृह मंत्री अमित शाह देंगे जवाब

सोमवार, 30 मार्च को भारतीय संसद की लोकसभा में देश को नक्सलवाद से पूरी तरह मुक्त करने के प्रयासों पर एक गहन चर्चा होगी। यह महत्वपूर्ण बातचीत लोकसभा के नियम 193 के तहत होगी, जो सदन को बिना किसी मतदान के जनहित के तात्कालिक महत्व के मुद्दों पर अल्पकालिक चर्चा की अनुमति देता है। स्पीकर ओम बिरला ने इस चर्चा को स्वीकार किया है, जिसके बाद शिवसेना सांसद श्रीकांत शिंदे इसे शुरू करेंगे। उनके साथ, टीडीपी सांसद डॉ. बायरेड्डी शबरी ने भी इस गंभीर राष्ट्रीय मुद्दे पर चर्चा का नोटिस दिया था। यह विषय देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए अत्यंत संवेदनशील और अहम है, और सरकार के लिए अपनी रणनीति और प्रगति का ब्यौरा देने का एक महत्वपूर्ण मंच है।

इस बहस में केंद्र सरकार की नक्सल विरोधी रणनीति, विभिन्न सुरक्षा बलों की समन्वित भूमिका और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में चलाए जा रहे विकास कार्यों की गहन समीक्षा की जाएगी। चर्चा के दौरान, देश के गृह मंत्री अमित शाह सदन को वामपंथी उग्रवाद के विरुद्ध अब तक मिली सफलताओं और चुनौतियों पर विस्तार से जानकारी देंगे। यह चर्चा गृह मंत्री द्वारा ‘उग्रवाद मुक्त भारत’ के लिए तय की गई 31 मार्च की समयसीमा से ठीक पहले होने जा रही है, जो सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। हालांकि, शाह ने देश को पूरी तरह से नक्सल आतंक से मुक्त करने का व्यापक लक्ष्य 31 मार्च 2026 तक का रखा है। इस बहस के जरिए सरकार यह बताने का प्रयास करेगी कि वह इस लक्ष्य की ओर कितनी मजबूती से आगे बढ़ रही है।

31 मार्च 2026 तक वामपंथी उग्रवाद समाप्त करने का संकल्प

दरअसल, गृह मंत्री अमित शाह ने लगभग एक साल पहले, देश को 31 मार्च 2026 तक वामपंथी उग्रवाद से पूरी तरह मुक्त करने का ऐतिहासिक संकल्प लिया था। इस घोषणा के बाद से, केंद्रीय सुरक्षा बल और राज्य पुलिस बल नक्सलवादियों के विरुद्ध लगातार और सघन अभियान चला रहे हैं। इन अभियानों का मुख्य उद्देश्य बचे हुए नक्सल कैडरों को या तो सुरक्षाबलों के सामने आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर करना है या उन्हें निष्क्रिय करना है, ताकि वे अपनी विध्वंसक गतिविधियों को अंजाम न दे सकें।

सरकार का मानना है कि नक्सलवाद केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र विशेष में विकास की कमी और स्थानीय आबादी के मुख्यधारा से भटकाव का भी परिणाम है। इसी कारण, सुरक्षा अभियानों के साथ-साथ, प्रभावित क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और संचार जैसी बुनियादी सुविधाओं के विकास पर भी विशेष जोर दिया जा रहा है। इन विकास परियोजनाओं का उद्देश्य स्थानीय लोगों को सरकार और व्यवस्था पर विश्वास दिलाना और उन्हें नक्सली विचारधारा से दूर रखना है।

नक्सल विरोधी अभियानों की अभूतपूर्व सफलता और आत्मसमर्पण की लहर

पिछले एक साल में, सुरक्षाबलों की निरंतर और प्रभावी कार्रवाई ने नक्सलवादी आंदोलन को गहरा झटका दिया है। इन अभियानों में कई कुख्यात नक्सलवादी मारे गए हैं, वहीं बड़ी संख्या में नक्सलियों ने सुरक्षाबलों के सामने आत्मसमर्पण करके हथियार डाल दिए हैं और समाज की मुख्यधारा में लौट आए हैं। यह प्रवृत्ति नक्सली नेतृत्व और कैडर के बीच बढ़ती हताशा और हौसला पस्त होने का स्पष्ट संकेत है। हाल के दिनों में हुए कुछ बड़े आत्मसमर्पण इस बात की गवाही देते हैं। 25 मार्च को, ओडिशा पुलिस के सामने वांछित माओवादी नेता सुक्रू ने अपने चार अन्य साथियों के साथ आत्मसमर्पण किया था। यह ओडिशा में नक्सल गतिविधियों पर एक बड़ी चोट थी। इससे ठीक एक दिन पहले, 24 मार्च को, छत्तीसगढ़ में नक्सलियों के वरिष्ठ कमांडर पापा राव ने अपने 17 सदस्यों के साथ सुरक्षाबलों के समक्ष हथियार डाल दिए थे। छत्तीसगढ़ जैसे गढ़ में इस स्तर का आत्मसमर्पण यह दिखाता है कि नक्सल आंदोलन अपनी पकड़ खो रहा है। इन आत्मसमर्पणों से न केवल सुरक्षाबलों को खुफिया जानकारी मिलती है, बल्कि यह अन्य नक्सलियों को भी हथियार डालने के लिए प्रेरित करता है।

बचे हुए नक्सलियों पर भविष्य में कार्रवाई की जानकारी देंगे शाह

केंद्र सरकार का आकलन है कि अब देश में बहुत ही गिने-चुने नक्सली बचे हैं, और वे भी ज्यादातर निष्क्रिय हालत में हैं। उनकी ताकत और प्रभाव पहले के मुकाबले काफी कम हो गया है। लोकसभा में गृह मंत्री अमित शाह इन बचे हुए नक्सलियों की संख्या, उनकी भौगोलिक उपस्थिति, उनकी वर्तमान स्थिति और उनके खिलाफ भविष्य में की जाने वाली कार्रवाई की विस्तृत जानकारी दे सकते हैं। यह जानकारी सरकार की आगामी रणनीति और नक्सलवाद को जड़ से खत्म करने की योजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होगी। इसके साथ ही, सरकार नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में अपनी भविष्य की योजनाओं, जिसमें विकास कार्य और पुनर्वास कार्यक्रम शामिल हैं, पर भी प्रकाश डालेगी। एक नई समीक्षा के बाद, नक्सली हिंसा से प्रभावित जिलों की संख्या देश में पहले के आठ से घटकर अब सात हो गई है, जो इस दिशा में मिली एक बड़ी और ठोस सफलता मानी जा रही है। यह कमी दर्शाती है कि नक्सलवाद का भौगोलिक प्रसार भी लगातार सिकुड़ रहा है।

इस चर्चा के माध्यम से सरकार न केवल अपने प्रयासों का विस्तृत ब्यौरा देश के सामने रखेगी, बल्कि यह सांसदों को भी इस गंभीर आंतरिक सुरक्षा चुनौती पर अपने विचार, सुझाव और चिंताओं को सामने रखने का अवसर प्रदान करेगी। उम्मीद है कि इस महत्वपूर्ण बहस से नक्सलवाद से निपटने की राष्ट्रीय रणनीति को और अधिक धार मिलेगी और ‘नक्सल मुक्त भारत’ का लक्ष्य निर्धारित समय सीमा, यानी 31 मार्च 2026 तक, सफलतापूर्वक हासिल करने में महत्वपूर्ण मदद मिलेगी। यह चर्चा देश के उन लाखों लोगों के लिए भी उम्मीद की किरण है, जो दशकों से नक्सली हिंसा और आतंक का दंश झेल रहे हैं।