विश्व जल दिवस पर इंदौर में दिखी जागरूकता, पर्यावरणविदों ने संभाली कान्ह नदी की सफाई

विश्व जल दिवस के अवसर पर इंदौर में एक अलग ही दृश्य देखने को मिला। जहां एक ओर लोग पानी की किल्लत और प्रदूषण की बात करते हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ लोग इसे बदलने के लिए मैदान में उतरते भी नजर आए। रविवार को शहर के पर्यावरणविद, सामाजिक कार्यकर्ता और जागरूक नागरिक कृष्णपुरा छत्री

Mar 23, 2026 - 08:30
विश्व जल दिवस पर इंदौर में दिखी जागरूकता, पर्यावरणविदों ने संभाली कान्ह नदी की सफाई

विश्व जल दिवस के अवसर पर इंदौर में एक अलग ही दृश्य देखने को मिला। जहां एक ओर लोग पानी की किल्लत और प्रदूषण की बात करते हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ लोग इसे बदलने के लिए मैदान में उतरते भी नजर आए। रविवार को शहर के पर्यावरणविद, सामाजिक कार्यकर्ता और जागरूक नागरिक कृष्णपुरा छत्री स्थित कान्ह नदी के घाट पर एकत्र हुए और सफाई अभियान की शुरुआत की।

यह सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि एक संदेश था कि अगर हम खुद आगे बढ़ें, तो बदलाव संभव है। कान्ह नदी, जो कभी इंदौर की जीवनरेखा मानी जाती थी, आज गंदगी और प्रदूषण से जूझ रही है। ऐसे में इस तरह के प्रयास उम्मीद की एक नई किरण बनकर सामने आते हैं।

कान्ह नदी की हालत क्यों बनी चिंता का विषय

पिछले 25 वर्षों में कान्ह नदी को साफ और पुनर्जीवित करने के लिए करीब 500 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च किए जा चुके हैं। अलग-अलग प्रोजेक्ट्स के तहत कई योजनाएं बनाई गईं, लेकिन इसके बावजूद आज भी नदी की स्थिति संतोषजनक नहीं है।

शहर की बढ़ती आबादी, सीवेज का सीधा बहाव और लापरवाही ने इस नदी को काफी नुकसान पहुंचाया है। यही वजह है कि अब सामाजिक संस्थाएं और पर्यावरणविद खुद आगे आकर इसे बचाने की कोशिश कर रहे हैं। कान्ह नदी सफाई अभियान अब सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक आंदोलन का रूप लेता जा रहा है।

कृष्णपुरा घाट पर सफाई अभियान, लोगों ने खुद संभाली जिम्मेदारी

रविवार को अभ्यास मंडल से जुड़े कार्यकर्ताओं ने कृष्णपुरा छत्री घाट पर सबसे पहले चारों तरफ फैले कचरे को हटाया। घाट की सीढ़ियों और आसपास के क्षेत्र में जमा गंदगी को साफ किया गया। इसके बाद पानी डालकर घाट को धोया गया, जिससे वहां साफ-सफाई का माहौल बन सके।

सफाई के बाद एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें लोटे से शुद्ध जल नदी में अर्पित किया गया। यह एक प्रतीकात्मक प्रयास था, जिसका उद्देश्य लोगों को यह बताना था कि हमें अपने जल स्रोतों को शुद्ध और सुरक्षित रखना चाहिए।

इस मौके पर मौजूद लोगों ने कहा कि कान्ह नदी की सफाई सिर्फ प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि हर नागरिक का कर्तव्य है। जब तक आम लोग इसमें भागीदारी नहीं निभाएंगे, तब तक कोई भी योजना पूरी तरह सफल नहीं हो सकती।

कान्ह नदी का शिप्रा से जुड़ाव और बढ़ती चिंता

कान्ह नदी सिर्फ इंदौर तक सीमित नहीं है। यह आगे जाकर शिप्रा नदी में मिलती है, जो धार्मिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। उज्जैन में हर 12 साल में होने वाला सिंहस्थ मेला इसी शिप्रा नदी के किनारे आयोजित होता है, जिसमें करोड़ों श्रद्धालु स्नान करने आते हैं।

अगर कान्ह नदी दूषित रहती है, तो इसका सीधा असर शिप्रा नदी पर पड़ता है। यही कारण है कि पर्यावरणविद लगातार इस मुद्दे को उठा रहे हैं। उनका कहना है कि अगर अभी भी ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले समय में स्थिति और गंभीर हो सकती है। इसलिए कान्ह नदी सफाई अभियान का महत्व और भी बढ़ जाता है, क्योंकि यह सिर्फ एक शहर की नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की जल गुणवत्ता से जुड़ा मुद्दा है।

जल संरक्षण का संदेश और पक्षियों के लिए पहल

इस अभियान के दौरान सिर्फ नदी की सफाई ही नहीं की गई, बल्कि जल संरक्षण को लेकर भी लोगों को जागरूक किया गया। कार्यक्रम में मौजूद लोगों को शपथ दिलाई गई कि वे पानी की बर्बादी नहीं करेंगे और जल स्रोतों को बचाने के लिए काम करेंगे।

इसके साथ ही गर्मी के मौसम को देखते हुए पक्षियों के लिए सकोरे भी वितरित किए गए। ये मिट्टी के बर्तन होते हैं, जिनमें पानी भरकर पक्षियों के लिए रखा जाता है। यह छोटा सा प्रयास भी पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक बड़ा कदम माना जाता है।

कार्यक्रम में कई सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरण प्रेमी शामिल हुए, जिन्होंने मिलकर यह संदेश दिया कि अगर हर व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी समझे, तो पर्यावरण को बचाया जा सकता है।

कान्ह नदी सफाई अभियान का बढ़ता असर

इंदौर में कान्ह नदी सफाई अभियान धीरे-धीरे लोगों के बीच जागरूकता फैला रहा है। अब ज्यादा लोग इस अभियान से जुड़ रहे हैं और अपने स्तर पर प्रयास कर रहे हैं।

हालांकि चुनौतियां अभी भी बड़ी हैं, लेकिन इस तरह के छोटे-छोटे प्रयास ही बड़े बदलाव की नींव रखते हैं। यह जरूरी है कि प्रशासन और जनता मिलकर काम करें, ताकि कान्ह नदी को फिर से स्वच्छ और जीवंत बनाया जा सके।

आज जरूरत है कि ऐसे अभियानों को लगातार चलाया जाए और ज्यादा से ज्यादा लोगों को इससे जोड़ा जाए। तभी जाकर इस नदी को उसका पुराना स्वरूप वापस मिल सकता है।