प्रधानमंत्री की मिमिक्री पर सस्पेंड शिक्षक को हाईकोर्ट ने दी राहत, निलंबन आदेश पर लगाई रोक, भाजपा विधायक ने दर्ज कराई थी शिकायत, जानें पूरा मामला

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मिमिक्री वाले वीडियो पर सस्पेंड किए गए एक प्राथमिक शिक्षक को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि किसी को निलंबित करने का अधिकार होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि इस अधिकार का इस्तेमाल पूरी समझदारी और ठोस वजहों के

Mar 27, 2026 - 19:30
प्रधानमंत्री की मिमिक्री पर सस्पेंड शिक्षक को हाईकोर्ट ने दी राहत, निलंबन आदेश पर लगाई रोक, भाजपा विधायक ने दर्ज कराई थी शिकायत, जानें पूरा मामला

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मिमिक्री वाले वीडियो पर सस्पेंड किए गए एक प्राथमिक शिक्षक को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि किसी को निलंबित करने का अधिकार होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि इस अधिकार का इस्तेमाल पूरी समझदारी और ठोस वजहों के साथ होना चाहिए। अदालत ने शिक्षक के निलंबन आदेश पर रोक लगा दी और संबंधित अधिकारी को पूरे मामले पर नए सिरे से विचार करने के निर्देश दिए हैं। इस फैसले से उन सरकारी कर्मचारियों को बल मिला है, जिन्हें सोशल मीडिया पर अपनी राय रखने के लिए जल्दबाजी में कार्रवाई का सामना करना पड़ता है।

यह पूरा मामला शिवपुरी जिले के प्राथमिक शिक्षक साकेत कुमार पुरोहित से जुड़ा है। उन्हें 13 मार्च 2026 को फेसबुक पर एक वीडियो पोस्ट करने के बाद निलंबित कर दिया गया था। साकेत पुरोहित ने अपने वीडियो में गैस सिलेंडर के लगातार बढ़ते दामों पर टिप्पणी करते हुए प्रधानमंत्री की मिमिक्री की थी। यह वीडियो सोशल मीडिया पर काफी चर्चा में रहा था और कुछ ही समय में अधिकारियों तक इसकी शिकायत पहुंच गई।

शिक्षक ने प्रधानमंत्री की मिमिक्री करते हुए क्या कहा था?

वीडियो में शिक्षक ने प्रधानमंत्री के बोलने के अंदाज में मिमिक्री करते हुए कहा था, “मेरे प्यारे भाइयों-बहनों… गैस के दाम कम हुए? नहीं हुए… बढ़े? बढ़ गए। भाइयों-बहनों, गैस की रोटी खाने से पेट में भी गैस बनती है। अगर पेट में गैस बनेगी तो आप बीमार पड़ जाएंगे, और अगर आप बीमार पड़ेंगे तो देश भी बीमार पड़ जाएगा… इसलिए गैस के दाम बढ़ने से अब आम आदमी भी चूल्हे की रोटी खाएगा और अमीर भी… और अमीर-गरीब के बीच की खाई कम हो जाएगी, भाइयों-बहनों…” शिक्षक के इस अंदाज और शब्दों पर कुछ लोगों ने आपत्ति जताई, जबकि कई लोगों ने इसे व्यंग्य के रूप में देखा।

भाजपा विधायक ने दर्ज कराई थी शिकायत

वीडियो पोस्ट होने के तुरंत बाद, पिछोर से भाजपा विधायक प्रीतम लोधी ने इस पर आपत्ति जताते हुए शिकायत दर्ज कराई। विधायक की शिकायत के बाद शिक्षा विभाग ने बिना किसी स्वतंत्र जांच या लंबी प्रक्रिया का इंतजार किए तत्काल कार्रवाई की। शिक्षक साकेत कुमार पुरोहित को निलंबित कर दिया गया और उन्हें बीईओ कार्यालय बदरवास से अटैच कर दिया गया। विभागीय अधिकारियों ने इस कार्रवाई को आवश्यक बताते हुए कहा कि एक सरकारी कर्मचारी को इस तरह से सार्वजनिक मंच पर टिप्पणी नहीं करनी चाहिए।

याचिकाकर्ता ने कहा- कोई मानहानि या नियम उल्लंघन नहीं हुआ

निलंबन आदेश के खिलाफ शिक्षक साकेत कुमार पुरोहित ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ में याचिका दायर की। याचिका में शिक्षक की ओर से उनके वकील ने जोरदार पैरवी करते हुए कहा कि वीडियो में ऐसी कोई भी बात नहीं थी जिसे आपत्तिजनक माना जा सके। उन्होंने तर्क दिया कि यह सिर्फ व्यंग्यात्मक टिप्पणी थी और इसमें किसी भी तरह से मानहानि या सरकारी नियमों का उल्लंघन नहीं किया गया था। याचिकाकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि विभाग ने बिना किसी स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच के जल्दबाजी में यह कार्रवाई की, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।

सुनवाई के दौरान, राज्य शासन ने कोर्ट के सामने अपना पक्ष रखा। शासन के वकील ने दलील दी कि निलंबन कोई सजा नहीं है। यह सिर्फ एक अंतरिम कदम है, जिसे किसी मामले में निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए उठाया जाता है। शासन ने कहा कि शिक्षक को निलंबित करने का मकसद जांच प्रक्रिया को प्रभावित होने से रोकना था, न कि उन्हें किसी अपराध की सजा देना। यह एक प्रशासनिक निर्णय था जो नियमों के तहत लिया गया।

निलंबन कार्रवाई के लिए ठोस आधार और स्पष्ट कारण जरूरी

हालांकि, न्यायमूर्ति आशीष श्रोती की एकल पीठ ने शासन की दलीलों पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने साफ कहा कि किसी भी सरकारी कर्मचारी को निलंबित करने का अधिकार होना पर्याप्त नहीं है। इस अधिकार का इस्तेमाल बहुत सोच-समझकर और विवेकपूर्ण तरीके से किया जाना चाहिए। निलंबन जैसी कड़ी कार्रवाई के लिए ठोस आधार और स्पष्ट कारण होने चाहिए। कोर्ट ने कहा कि बिना मजबूत आधार के किसी को निलंबित करना, प्रशासन की मनमानी को दर्शाता है और यह कर्मचारियों के अधिकारों का हनन है।

अदालत ने मामले में की गई कार्रवाई पर उठाए सवाल

अदालत ने इस मामले में की गई कार्रवाई पर भी सवाल उठाए। कोर्ट ने माना कि विधायक की शिकायत के तुरंत बाद ही निलंबन आदेश जारी कर देना, संबंधित अधिकारी की स्वतंत्र सोच पर संदेह पैदा करता है। ऐसा लगता है कि अधिकारी ने बिना अपने विवेक का इस्तेमाल किए, सिर्फ शिकायत के आधार पर कार्रवाई कर दी। कोर्ट ने यह भी पाया कि इस पूरे प्रकरण में साल 2005 के शासन निर्देशों का भी ठीक से पालन नहीं किया गया। इन निर्देशों में निलंबन से पहले अपनाई जाने वाली प्रक्रियाओं और मानकों का उल्लेख होता है, जिनका उल्लंघन हुआ।

इन सभी तथ्यों और दलीलों पर विचार करने के बाद, कोर्ट ने प्रथम दृष्टया निलंबन आदेश को त्रुटिपूर्ण और नियमों के विपरीत माना। अदालत ने तत्काल प्रभाव से निलंबन आदेश पर रोक लगा दी। साथ ही, कोर्ट ने निर्देश दिए कि संबंधित अधिकारी इस पूरे मामले पर सभी तथ्यों और लागू नियमों को ध्यान में रखते हुए नए सिरे से निर्णय लें। इस आदेश के बाद, साकेत कुमार पुरोहित को वापस नौकरी पर लौटने का मौका मिलेगा, जब तक कि विभाग नए सिरे से जांच करके कोई अंतिम फैसला नहीं ले लेता। यह फैसला सरकारी कर्मचारियों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है, खासकर सोशल मीडिया पर उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संबंध में।

Anand Sahay पत्रकारिता के क्षेत्र में कई वर्षों का अनुभव है और ब्रेकिंग न्यूज़ तथा राष्ट्रीय खबरों को कवर करने में विशेष रुचि रखते हैं। महत्वपूर्ण घटनाओं का विश्लेषण कर सटीक और भरोसेमंद जानकारी पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास किया जाता है।