अल नीनो की आहट से बारिश पर मंडराया संकट! जानिए क्या भारत पर भी पड़ेगा असर? पढ़ें खबर
प्रशांत महासागर की गहराइयों से उठ रही एक अदृश्य चुनौती अब पूरी दुनिया के मौसम का मिजाज बदलने और भारत पर कहर बरपाने को तैयार खड़ी है। दरअसल यह कोई साधारण मौसमी बदलाव नहीं, बल्कि ‘अल नीनो’ नामक वह प्राकृतिक घटना है, जिसकी आहट मात्र से ही बाढ़, सूखे और भयंकर लू का तांडव मचने
प्रशांत महासागर की गहराइयों से उठ रही एक अदृश्य चुनौती अब पूरी दुनिया के मौसम का मिजाज बदलने और भारत पर कहर बरपाने को तैयार खड़ी है। दरअसल यह कोई साधारण मौसमी बदलाव नहीं, बल्कि ‘अल नीनो’ नामक वह प्राकृतिक घटना है, जिसकी आहट मात्र से ही बाढ़, सूखे और भयंकर लू का तांडव मचने की आशंका गहरा जाती है।
क्या होता है अल नीनो?
दरअसल मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का समय-समय पर गर्म होना ही अल नीनो कहलाता है। यह गर्माहट इतनी प्रचंड होती है कि रेन सिस्टम में होने वाला मामूली सा डिस्टरबेंस भी पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लेता है। अमेरिकी नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन के मौसम विशेषज्ञों ने इस बार अटलांटिक तूफान को सामान्य से शांत रहने का अनुमान लगाया है, जिसके पीछे अल नीनो का ही हाथ बताया जा रहा है। विशेषज्ञों की मानें तो सामान्य से कम तूफानी गतिविधि की 55 प्रतिशत संभावना है, जबकि सामान्य से अधिक गतिविधि की संभावना महज 10 प्रतिशत ही है।
क्या इस बार अल नीनो का असर दिखाई देगा?
वहीं अटलांटिक तूफान का मौसम जून की शुरुआत से 30 नवंबर तक चलता है, जिसमें तूफानी गतिविधियां सितंबर के मध्य में अपनी चरम पर होती हैं। लेकिन अल नीनो के चलते इस बार अटलांटिक में तूफानों का जोर कुछ कम रह सकता है। हालांकि, प्रशांत महासागर में पैदा होने वाली यह मौसमी घटना दुनिया के कई हिस्सों में बाढ़, सूखे और लू की तीव्रता को बढ़ाने का काम करती है। अपने सक्रिय चरण के दौरान यह वैश्विक औसत तापमान को भी अप्रत्याशित रूप से बढ़ा देती है, जिससे हर तरफ हाहाकार मचने का खतरा रहता है।
‘ला नीना’ क्या है?
दरअसल अल नीनो की घटनाएं आमतौर पर हर 2 से 7 साल में एक बार दस्तक देती हैं और इनका प्रभाव 9 से 12 महीने तक कायम रहता है। इसके विपरीत ‘ला नीना’ है, जिसका अर्थ प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से ठंडा होना है। अल नीनो के दौरान हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं या अपनी दिशा बदल लेती हैं, जिससे प्रशांत महासागर का गर्म पानी वापस पूर्व की ओर अमेरिका के तटों की ओर बहने लगता है। यह अटलांटिक तूफानों की गतिविधियों को कम करता है, जबकि प्रशांत महासागर में तूफानों की गतिविधियों को बढ़ा देता है। एक तरफ राहत तो दूसरी तरफ आफत का यह खेल प्रकृति का ही अजब करिश्मा है।
भले ही अल नीनो की शुरुआत प्रशांत महासागर में होती हो, लेकिन इसका प्रभाव पूरी दुनिया में किसी भूचाल से कम नहीं होता। भारत, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिणी और मध्य अफ्रीका, और अमेजन बेसिन जैसे क्षेत्रों को भीषण गर्मी और जंगलों में लगने वाली आग का सामना करना पड़ेगा। अमेरिका के कुछ हिस्सों, खासकर दक्षिणी भाग में भारी बारिश और बाढ़ तबाही मचा सकती है, जबकि उत्तरी अमेरिका में भी असहनीय गर्मी का प्रकोप देखने को मिल सकता है।
भारत पर अल नीनो का सीधा और भयंकर असर होगा। देश को लंबी गर्मी के थपेड़ों का सामना करना पड़ेगा। मॉनसून के मौसम में सामान्य से कम बारिश होने की प्रबल संभावना है, जिसका सीधा खामियाजा किसानों को भुगतना पड़ेगा। फसलों की पैदावार कम हो जाएगी और इसका असर सीधे हमारी थाली पर पड़ेगा, जब खाने-पीने की चीजों के दाम आसमान छूने लगेंगे। जलवायु परिवर्तन के चलते भारत में पहले ही तापमान बढ़ रहा है और अल नीनो का आगमन इस आग में घी डालने का काम करेगा। ऐसे में आने वाले महीनों में हमें प्रकृति के इस क्रूर चक्र से निपटने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ेगा, वरना मुंह की खानी पड़ सकती है।