निजी स्कूलों की मनमानी कीमतों पर सांसद इकरा हसन ने लोकसभा में लगाई लगाम की गुहार, फुले दंपति के लिए मांगा भारत रत्न
समाजवादी पार्टी की कैराना सांसद इकरा हसन ने लोकसभा में शुक्रवार को देश के महान समाज सुधारक और शिक्षाविद महात्मा ज्योतिबा फुले तथा उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले को मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित करने की पुरजोर मांग की। उन्होंने शून्यकाल के दौरान सदन का ध्यान इन दो महान विभूतियों के अतुलनीय योगदान की ओर आकर्षित
समाजवादी पार्टी की कैराना सांसद इकरा हसन ने लोकसभा में शुक्रवार को देश के महान समाज सुधारक और शिक्षाविद महात्मा ज्योतिबा फुले तथा उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले को मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित करने की पुरजोर मांग की। उन्होंने शून्यकाल के दौरान सदन का ध्यान इन दो महान विभूतियों के अतुलनीय योगदान की ओर आकर्षित किया, जिन्होंने शिक्षा को समाज परिवर्तन का सबसे सशक्त माध्यम बनाया और महिला शिक्षा की नींव रखी। इकरा हसन ने कहा, ‘शिक्षा समाज परिवर्तन का सबसे सशक्त माध्यम है, जिसकी जीवंत मिसाल महात्मा ज्योतिबा फुले जी और महिला शिक्षा की जनक सावित्रीबाई फुले जी हैं। उनके अतुलनीय योगदान को सम्मान देते हुए, शिक्षा के प्रसार हेतु दोनों महान विभूतियों को भारत रत्न से सम्मानित किया जाना चाहिए।’
महात्मा ज्योतिबा फुले (1827-1890) ने 19वीं सदी में भारत में सामाजिक क्रांति का सूत्रपात किया। उन्होंने महाराष्ट्र में जाति व्यवस्था, अस्पृश्यता और सामाजिक असमानता के खिलाफ आवाज उठाई। ज्योतिबा फुले ने ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना की, जिसका उद्देश्य समाज के सभी वर्गों, विशेषकर दलितों और पिछड़ों को शिक्षा और सामाजिक अधिकार दिलाना था। उन्होंने विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया और बाल विवाह का विरोध किया। उनके विचार और कार्य आज भी सामाजिक न्याय के आंदोलन को प्रेरित करते हैं।
भारत का पहला लड़कियों का स्कूल खोला
उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले (1831-1897) ने शिक्षा और महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान दिया। उन्हें भारत की पहली महिला शिक्षिका और पहली महिला प्रधानाध्यापिका माना जाता है। 1848 में, उन्होंने अपने पति के साथ मिलकर पुणे में भारत का पहला लड़कियों का स्कूल खोला। उस दौर में जब महिलाओं का पढ़ना-लिखना समाज के लिए वर्जित माना जाता था, सावित्रीबाई ने अदम्य साहस दिखाते हुए न केवल शिक्षा ग्रहण की, बल्कि हजारों लड़कियों और वंचितों को शिक्षा प्रदान की। उन्होंने कई और स्कूल स्थापित किए और समाज में महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए अथक प्रयास किए। इकरा हसन ने संसद में इन दोनों के ऐतिहासिक योगदान को रेखांकित करते हुए राष्ट्रीय सम्मान की आवश्यकता पर बल दिया।
इसी शून्यकाल के दौरान, सांसद इकरा हसन ने एक और महत्वपूर्ण जनहित का मुद्दा उठाया, जो लाखों अभिभावकों के लिए चिंता का विषय है। उन्होंने निजी स्कूलों में किताबों और यूनिफॉर्म की अत्यधिक कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार से सख्त दिशानिर्देश जारी करने की मांग की। इकरा ने लोकसभा में बताया कि किस तरह सीबीएसई बोर्ड से मान्यता प्राप्त कई निजी स्कूल अभिभावकों पर अनावश्यक वित्तीय बोझ डाल रहे हैं।
शिक्षा को एक व्यवसाय में बदल रहा
उन्होंने कहा, ‘स्कूल प्रबंधन किसी एक किताब विक्रेता को तय कर देते हैं जहां से ही अभिभावकों को किताबें और यूनिफॉर्म खरीदनी पड़ती है।’ इस व्यवस्था से बाजार में प्रतिस्पर्धा खत्म हो जाती है और अभिभावकों के पास विकल्प नहीं बचता। उन्हें मजबूरन तय दुकानों से महंगी किताबें और स्कूल यूनिफॉर्म खरीदने पड़ते हैं, जिससे उनकी मासिक बजट पर भारी असर पड़ता है। सांसद ने इस ‘एकाधिकार’ की स्थिति को खत्म करने की आवश्यकता पर जोर दिया, जो शिक्षा को एक व्यवसाय में बदल रहा है।
निजी स्कूलों की मनमानी कीमतों पर अंकुश लगाने की मांग
अपनी बात रखते हुए इकरा हसन ने सरकार से कई ठोस कदम उठाने का आग्रह किया। उन्होंने मांग की कि निजी प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित महंगी पुस्तकों पर तुरंत रोक लगाई जाए। इसके साथ ही, किसी एक विशिष्ट विक्रेता से किताबें और यूनिफॉर्म खरीदने की अनिवार्यता को भी समाप्त किया जाए, ताकि अभिभावकों को अपनी पसंद और बजट के अनुसार खरीदारी करने की स्वतंत्रता मिल सके।
सांसद ने यह भी सुझाव दिया कि यूनिफॉर्म और किताबों की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए एक राष्ट्रीय स्तर पर दिशानिर्देश तैयार किए जाएं, जिससे पूरे देश में निजी स्कूलों में एकरूपता और पारदर्शिता आ सके। इसके अतिरिक्त, इकरा ने अभिभावकों की शिकायतों के लिए एक ऑनलाइन पोर्टल की सुविधा उपलब्ध कराने की मांग की, जहां वे स्कूलों द्वारा की जा रही मनमानी और अधिक वसूली से संबंधित शिकायतें दर्ज करा सकें। उन्होंने कहा कि ऐसी शिकायतों पर स्कूल प्रबंधन के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए, ताकि उन्हें भविष्य में ऐसी गतिविधियों को दोहराने से रोका जा सके।
शून्यकाल भारतीय संसद की एक महत्वपूर्ण परंपरा है, जिसमें सांसद बिना किसी पूर्व सूचना के तुरंत सार्वजनिक महत्व के विषयों को उठा सकते हैं। यह सरकार का ध्यान जनहित के मुद्दों की ओर आकर्षित करने का एक प्रभावी माध्यम है। इकरा हसन ने इसी मंच का उपयोग करते हुए सामाजिक न्याय और शिक्षा के अधिकार से जुड़े इन दोनों अहम मुद्दों को उठाया, जो सीधे तौर पर समाज के बड़े वर्ग को प्रभावित करते हैं।
इसी दिन, समाजवादी पार्टी के एक अन्य सांसद आनंद भदौरिया ने भी लोकसभा में एक गंभीर मुद्दा उठाया। उन्होंने उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में स्वतंत्रता सेनानी अशफाक उल्ला खान, राम प्रसाद बिस्मिल और रोशन सिंह की मूर्तियों को कथित तौर पर तोड़े जाने का विषय उठाया। भदौरिया ने सरकार से ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की मांग की, ताकि देश के शहीदों का अपमान न हो।
कुल मिलाकर, सांसद इकरा हसन द्वारा उठाए गए ये मुद्दे शिक्षा क्षेत्र में व्याप्त असमानताओं और चुनौतियों को दर्शाते हैं। उनकी भारत रत्न की मांग देश के ऐतिहासिक नायकों को उचित सम्मान दिलाने और उनके आदर्शों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास है, वहीं निजी स्कूलों से संबंधित मांगें आज के समय में शिक्षा को आम आदमी के लिए अधिक सुलभ और किफायती बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। अब यह देखना होगा कि सरकार इन मांगों पर क्या संज्ञान लेती है और आगे क्या कार्रवाई करती है।