अमेरिका की लाख पैंतरेबाजी के बावजूद अटूट है भारत-रूस की दोस्ती, जयशंकर के बेबाक रुख ने साफ की भारत की नीति

अमेरिकी टैरिफ और पाबंदियों की धमकियों के बीच विदेश मंत्री एस जयशंकर ने साफ कर दिया है कि 1.4 अरब भारतीयों की ऊर्जा सुरक्षा सर्वोपरि है। अमेरिका के लाख पैंतरे और 100% तक टैरिफ लगाने के दबाव के बावजूद भारत और रूस की दोस्ती अटूट है। भारत अपने राष्ट्रीय हितों और स्वतंत्र विदेश नीति से कभी समझौता नहीं करेगा।

Sep 21, 2026 - 09:30
अमेरिका की लाख पैंतरेबाजी के बावजूद अटूट है भारत-रूस की दोस्ती, जयशंकर के बेबाक रुख ने साफ की भारत की नीति

New Delhi: वैश्विक कूटनीति के पटल पर इन दिनों अमेरिका और पश्चिमी देशों की ओर से भारत पर लगातार दबाव बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं। अमेरिकी संसद में रूस और ईरान से तेल-गैस खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का कानून (लिंडसे ओ. ग्राहम सेंक्शनिंग रशिया एक्ट) आगे बढ़ने के बाद से चर्चाओं का बाजार गर्म है। हालांकि, भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने इन तमाम धमकियों और अमेरिकी पैंतरेबाजी के बीच देश का रुख बेहद स्पष्ट कर दिया है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा है कि 1.4 अरब भारतीयों की ऊर्जा सुरक्षा हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है। यूक्रेन दौरे और अन्य प्रमुख वैश्विक मंचों पर जयशंकर ने बार-बार यह साबित किया है कि भारत अपने ऊर्जा संसाधन या कोई अन्य सामान खरीदने का फैसला किसी तीसरे देश के दबाव में नहीं, बल्कि अपने आर्थिक हितों को ध्यान में रखकर ही करेगा।

दोहरे रवैये पर कड़ा प्रहार: ‘जब फायदा होता है, तब वे नियम बदलते हैं’

पश्चिमी देशों की नीतियों पर निशाना साधते हुए विदेश मंत्री ने अमेरिकी टैरिफ और पाबंदियों के दोहरे रवैये की पोल खोल दी है। उन्होंने तीखा हमला करते हुए कहा कि अमेरिका और पश्चिमी देश हमेशा अपनी सहूलियत के हिसाब से नियम तय करते हैं। जयशंकर ने अपने बेबाक अंदाज में कहा, “जब उन्हें सूट करता है तो वे पाबंदियां लगा देते हैं, जब सूट नहीं करता तो हटा देते हैं। हम सभी समझदार लोग हैं और जानते हैं कि यह क्या गेम है।” उन्होंने यह भी तार्किक सवाल उठाया कि जब यूरोप और चीन जैसे बड़े देश धड़ल्ले से रूस से ऊर्जा खरीद रहे हैं, तो केवल भारत को निशाना बनाना पूरी तरह से अनुचित और भेदभावपूर्ण है।

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अतीत से सबक: 50 प्रतिशत टैरिफ का असर नहीं, तो 100 प्रतिशत से क्या फर्क पड़ेगा!

ऐतिहासिक संदर्भों को देखें तो जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने भारतीय सामानों पर भारी पारस्परिक शुल्क (टैरिफ) लगाया था, तब भी जयशंकर ने उसे ‘अनुचित और अतार्किक’ करार दिया था। उस वक्त भी अमेरिकी दबाव के आगे भारत न तो डगमगाया और न ही अपनी स्वतंत्र नीति से पीछे हटा। भारत का यह इतिहास गवाह रहा है कि जब अमेरिका पहले भी 50 प्रतिशत तक टैरिफ लगा चुका है, तब भी भारतीय अर्थव्यवस्था पर कोई नकारात्मक फर्क नहीं पड़ा। ऐसे में, अब यदि 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने की बातें या धमकियां दी जा रही हैं, तो इससे भारत की मजबूत होती अर्थव्यवस्था और उसकी आत्मनिर्भर विदेश नीति पर कोई असर पड़ने वाला नहीं है।

किसानों के हितों से समझौता नहीं और वैश्विक अर्थव्यवस्था का ‘हथियारकरण’

व्यापार वार्ताओं के मोर्चे पर भी भारत ने अपनी ‘रेड लाइन्स’ तय कर रखी हैं। सरकार अपने देश के किसानों और छोटे उत्पादकों के हितों की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। व्यापार समझौते के नाम पर इनके हितों पर कोई आंच नहीं आने दी जाएगी। इसके साथ ही, जयशंकर ने वैश्विक मंचों पर चिंता जताई है कि आज की दुनिया में टैरिफ, पाबंदियों और व्यापार का ‘हथियारकरण’ (Weaponisation of everything) किया जा रहा है। भारत का स्पष्ट मानना है कि वैश्विक व्यवस्था किसी एक या दो शक्तियों के दबदबे वाली नहीं होनी चाहिए, बल्कि यह निष्पक्ष, स्वतंत्र और बहुध्रुवीय होनी चाहिए।

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कूटनीतिक रास्ते खुले, लेकिन शर्तों पर समझौता नामुमकिन

कड़े रुख के बावजूद, भारत ने कूटनीति के दरवाजे हमेशा खुले रखे हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो और अन्य शीर्ष अमेरिकी अधिकारियों के साथ लगातार वार्ताओं के जरिए भारत ने द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ावा देने और टैरिफ कम करने के लिए कूटनीतिक दबाव बनाए रखा है। भारत अमेरिका के साथ ट्रेड डील का स्वागत करता है, बशर्ते वह पूरी तरह से भारत के आर्थिक और राष्ट्रीय हितों के अनुकूल हो। कुल मिलाकर, अमेरिका की लाख पैंतरेबाजी और पाबंदियों के दबाव के बावजूद, भारत-रूस की दोस्ती और कूटनीतिक रिश्ते पूरी तरह अटूट हैं। एस. जयशंकर के इन बयानों ने यह साबित कर दिया है कि नया भारत वैश्विक मंचों पर अपनी शर्तों और राष्ट्रीय हितों के आधार पर स्वतंत्र फैसले लेने में पूरी तरह सक्षम है।

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