मादक पदार्थ नहीं अमचूर है… 16 साल की न्यायायिक लड़ाई के बाद आखिरकार हाई कोर्ट में हुई अजय की विजय

जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर टिप्पणी करते हुए न्यायालय ने एक इंजीनियर को हुई मानसिक, सामाजिक और पेशेवर क्षति के मामले में राज्य सरकार को दस लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। दरअसल हाईकोर्ट ने यह फैसला ग्वालियर के इंजीनियर अजय सिंह की 16 साल पुरानी कानूनी लड़ाई के बाद सुनाया,

May 21, 2026 - 20:30
मादक पदार्थ नहीं अमचूर है… 16 साल की न्यायायिक लड़ाई के बाद आखिरकार हाई कोर्ट में हुई अजय की विजय

जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर टिप्पणी करते हुए न्यायालय ने एक इंजीनियर को हुई मानसिक, सामाजिक और पेशेवर क्षति के मामले में राज्य सरकार को दस लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। दरअसल हाईकोर्ट ने यह फैसला ग्वालियर के इंजीनियर अजय सिंह की 16 साल पुरानी कानूनी लड़ाई के बाद सुनाया, जिसमें उन्हें अमचूर पाउडर को मादक पदार्थ समझने की गलती के कारण डेढ़ दशक तक मानसिक, सामाजिक और पेशेवर नुकसान झेलना पड़ा। वहीं अदालत ने माना कि तकनीकी खामी और जांच में देरी की वजह से एक निर्दोष व्यक्ति को लंबे समय तक प्रताड़ना का शिकार होना पड़ा।

दरअसल यह पूरा मामला वर्ष 2010 का है। ग्वालियर निवासी इंजीनियर अजय सिंह भोपाल स्थित राजा भोज एयरपोर्ट से दिल्ली जाने के लिए पहुंचे थे। एयरपोर्ट पर सुरक्षा जांच के दौरान उनके बैग को स्कैनिंग मशीन से जांचा गया। इसी दौरान एक्सप्लोसिव डिटेक्टर मशीन ने अलर्ट दिखाया, जिसके बाद सुरक्षा में तैनात अधिकारियों ने संदेह के आधार पर बैग की गहन तलाशी ली। तलाशी के दौरान बैग में एक पाउडर जैसा पदार्थ मिला। प्रारंभिक जांच में उसे मादक पदार्थ समझ लिया गया और बिना पर्याप्त पुष्टि के अजय सिंह को हिरासत में ले लिया गया।

गलतफहमी और तकनीकी त्रुटि से जुड़ा है पूरा मामला

वहीं पुलिस ने इस मामले में अजय सिंह के खिलाफ ड्रग्स तस्करी से जुड़े गंभीर प्रकरण दर्ज कर दिए और उन्हें जेल भेज दिया गया। जांच एजेंसियों की इस कार्रवाई के चलते एक शिक्षित और पेशेवर व्यक्ति को अपराधियों के बीच 57 दिनों तक जेल में रहना पड़ा। जिस पदार्थ को नशीला माना गया था, वह वास्तव में आमतौर पर रसोई में इस्तेमाल होने वाला अमचूर पाउडर निकला। इस सच्चाई का खुलासा तब हुआ जब फॉरेंसिक साइंस लैब की रिपोर्ट लगभग दो महीने बाद सामने आई, जिसके बाद यह स्पष्ट हुआ कि पूरा मामला गलतफहमी और तकनीकी त्रुटि का परिणाम था।

दरअसल फॉरेंसिक रिपोर्ट सामने आने के बाद अजय सिंह को जमानत मिल गई, लेकिन इस घटना ने उनके जीवन पर गहरा प्रभाव छोड़ा। उन्होंने इस मामले को लेकर न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और व्यवस्था की लापरवाही के खिलाफ अपनी कानूनी लड़ाई जारी रखी। लंबे समय बाद मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने इस पूरे मामले की सुनवाई करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की।

जानिए न्यायालय ने क्या कहा?

वहीं न्यायालय ने कहा कि केवल तकनीकी खराबी या संसाधनों की कमी के कारण किसी निर्दोष नागरिक की स्वतंत्रता छीनी नहीं जा सकती। अदालत ने स्पष्ट रूप से माना कि जांच एजेंसियों को किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई करने से पहले तथ्यों की पूरी पुष्टि करनी चाहिए। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि इस घटना से याचिकाकर्ता की सामाजिक प्रतिष्ठा, करियर और मानसिक स्थिति को गंभीर क्षति पहुंची है, जिसकी भरपाई पूरी तरह से संभव नहीं है।

दरअसल जबलपुर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश देते हुए अजय सिंह को 10 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया। अदालत का यह फैसला न केवल पीड़ित को राहत देने वाला है, बल्कि सुरक्षा एजेंसियों और फॉरेंसिक विभागों के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश माना जा रहा है। यह निर्णय स्पष्ट करता है कि वैज्ञानिक जांच और सुरक्षा प्रक्रिया के नाम पर किसी भी नागरिक के मौलिक अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती। इस संबंध में सरकारी अधिवक्ता सुमित रघुवंशी ने अपनी बाइट दी।

Anand Sahay पत्रकारिता के क्षेत्र में कई वर्षों का अनुभव है और ब्रेकिंग न्यूज़ तथा राष्ट्रीय खबरों को कवर करने में विशेष रुचि रखते हैं। महत्वपूर्ण घटनाओं का विश्लेषण कर सटीक और भरोसेमंद जानकारी पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास किया जाता है।