PM मोदी के स्वतंत्रता दिवस के भाषण पर आरिफ मसूद ने जताई आपत्ति, बोले- ‘मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों का जिक्र क्यों नहीं?’

भोपाल से कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद ने स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लाल किले से दिए भाषण को लेकर आपत्ति जताई है। आरिफ मसूद का कहना है कि प्रधानमंत्री ने आजादी की लड़ाई के कई सेनानियों का जिक्र किया लेकिन मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों के नाम सामने नहीं रखे। उन्होंने इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री

Aug 16, 2026 - 21:30
PM मोदी के स्वतंत्रता दिवस के भाषण पर आरिफ मसूद ने जताई आपत्ति, बोले- ‘मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों का जिक्र क्यों नहीं?’

भोपाल से कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद ने स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लाल किले से दिए भाषण को लेकर आपत्ति जताई है। आरिफ मसूद का कहना है कि प्रधानमंत्री ने आजादी की लड़ाई के कई सेनानियों का जिक्र किया लेकिन मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों के नाम सामने नहीं रखे। उन्होंने इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री को ज्ञापन भेजकर मुस्लिम सेनानियों के योगदान को भी देश के सामने रखने की मांग की है।

आरिफ मसूद ने कहा कि भारत की आजादी किसी एक धर्म या समुदाय की कोशिश का नतीजा नहीं थी। अंग्रेजों के खिलाफ लंबे संघर्ष में अलग-अलग इलाकों और समुदायों के लोगों ने हिस्सा लिया और कई लोगों ने अपनी जान भी गंवाई। विधायक आरिफ मसूद ने अपने ज्ञापन में इतिहास के अलग-अलग दौर का जिक्र करते हुए कहा कि आजादी की लड़ाई को व्यापक नजरिए से देखा जाना चाहिए।

मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान का किया जिक्र

दरअसल आरिफ मसूद ने अपने ज्ञापन में स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े कई नामों और घटनाओं का हवाला दिया है। उन्होंने 18वीं सदी के फकीर-संन्यासी आंदोलन का जिक्र करते हुए मजनू शाह फकीर, मूसा शाह, चिराग अली और नूरुल मोहम्मद जैसे नाम सामने रखे। उनका कहना है कि अंग्रेजी शासन के खिलाफ हुए आंदोलनों में अलग-अलग समुदायों के लोगों ने मिलकर विरोध किया था। विधायक ने 1857 के विद्रोह का उदाहरण भी दिया। उन्होंने अहमदुल्ला शाह मदरासी का जिक्र करते हुए दावा किया कि उन्होंने देश के कई हिस्सों में अंग्रेजों के खिलाफ लोगों को जोड़ने का काम किया था। मसूद ने अपने पत्र में यह भी कहा कि ब्रिटिश सरकार ने अहमदुल्ला शाह को पकड़ने के लिए इनाम की घोषणा की थी।

स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास सिर्फ कुछ बड़े नामों तक सीमित नहीं: आरिफ मसूद

आरिफ मसूद का कहना है कि स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास सिर्फ कुछ बड़े नामों तक सीमित नहीं है। उनके मुताबिक, जिन लोगों ने स्थानीय स्तर पर आंदोलन किए, लोगों को जोड़ा और अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी, उनके योगदान को भी याद किया जाना चाहिए। उन्होंने इसी आधार पर प्रधानमंत्री के भाषण में मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों का उल्लेख नहीं होने पर सवाल उठाया है।

1857 के विद्रोह को लेकर क्या कहा?

आरिफ मसूद ने अपने ज्ञापन में 1857 के विद्रोह के दौरान अंग्रेजों की कार्रवाई का भी जिक्र किया। उन्होंने दावा किया कि विद्रोह को दबाने के दौरान बड़ी संख्या में लोगों को बिना मुकदमे के सजा दी गई और इनमें मुस्लिम उलेमा तथा दूसरे स्वतंत्रता सेनानी भी शामिल थे। हालांकि, ज्ञापन में दिए गए ऐतिहासिक आंकड़ों और दावों की स्वतंत्र पुष्टि इस रिपोर्ट में नहीं की गई है। आरिफ मसूद ने अपने पत्र में ब्रिटिश अधिकारियों और इतिहास से जुड़ी किताबों का हवाला देते हुए कहा कि 1857 के संघर्ष में मुस्लिम समुदाय के कई लोगों ने अहम भूमिका निभाई थी। उन्होंने यह भी कहा कि देश के अलग-अलग हिस्सों में आजादी के आंदोलन की कहानी को समझने के लिए पुराने दस्तावेजों और स्मारकों को देखा जा सकता है।

विधायक ने इंडिया गेट के पास मौजूद नेशनल वॉर मेमोरियल और अंडमान-निकोबार की सेलुलर जेल का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां आजादी और देश की रक्षा से जुड़े लोगों के नाम दर्ज हैं। उनका तर्क है कि स्वतंत्रता संग्राम की चर्चा करते समय सभी समुदायों के योगदान को बराबर जगह मिलनी चाहिए।

Anand Sahay पत्रकारिता के क्षेत्र में कई वर्षों का अनुभव है और ब्रेकिंग न्यूज़ तथा राष्ट्रीय खबरों को कवर करने में विशेष रुचि रखते हैं। महत्वपूर्ण घटनाओं का विश्लेषण कर सटीक और भरोसेमंद जानकारी पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास किया जाता है।