विश्व साक्षरता दिवस: शिक्षा की अलख जलती रहे, सीएम डॉ. मोहन यादव ने दिया “साक्षर मध्यप्रदेश, समर्थ मध्यप्रदेश” का मंत्र

किसी बच्चे के हाथ में पहली बार पेंसिल आती है, वह अपने नाम का पहला अक्षर लिखता है या कोई व्यक्ति उम्र के बढ़ते पड़ाव पर किताब खोलकर पहली बार कोई शब्द पढ़ पाता है। ये छोटे-छोटे पल दरअसल जिंदगी में बड़े बदलाव की शुरुआत होते हैं। साक्षरता सिर्फ अक्षरों को पहचानने का नाम नहीं, […]

Sep 8, 2026 - 11:30
विश्व साक्षरता दिवस: शिक्षा की अलख जलती रहे, सीएम डॉ. मोहन यादव ने दिया “साक्षर मध्यप्रदेश, समर्थ मध्यप्रदेश” का मंत्र

किसी बच्चे के हाथ में पहली बार पेंसिल आती है, वह अपने नाम का पहला अक्षर लिखता है या कोई व्यक्ति उम्र के बढ़ते पड़ाव पर किताब खोलकर पहली बार कोई शब्द पढ़ पाता है। ये छोटे-छोटे पल दरअसल जिंदगी में बड़े बदलाव की शुरुआत होते हैं। साक्षरता सिर्फ अक्षरों को पहचानने का नाम नहीं, बल्कि दुनिया को समझने और अपने फैसले खुद लेने की ताकत है।

आज विश्व साक्षरता दिवस है। शब्दों की ताकत और उनके महत्व को रेखांकित करने के लिए हर साल 8 सितंबर को ये दिन  मनाया जाता है। विश्व साक्षरता दिवस पर मध्यप्रदेश के सीएम डॉ. मोहन यादव ने शिक्षा का प्रकाश समाज के हर व्यक्ति तक पहुंचाने का संकल्प लेने का आह्वान किया है। उन्होंने कहा कि “अक्षर ज्ञान से आत्मविश्वास, शिक्षा से आत्मनिर्भरता और ज्ञान से सशक्त समाज का निर्माण होता है। साक्षर मध्यप्रदेश, समर्थ मध्यप्रदेश और विकसित भारत की यही मजबूत नींव है।”

क्यों मनाया जाता है विश्व साक्षरता दिवस

निरक्षरता लंबे समय से दुनिया की बड़ी सामाजिक चुनौतियों में रही है। जिस व्यक्ति को पढ़ना-लिखना नहीं आता उसके लिए रोजमर्रा के कई छोटे-बड़े काम भी मुश्किल हो सकते हैं। वह जरूरी जानकारी पढ़ने, दस्तावेज समझने, सरकारी योजनाओं का लाभ लेने या अपने अधिकारों को जानने में कठिनाई महसूस कर सकता है। इसी समस्या की ओर वैश्विक ध्यान खींचने के लिए यूनेस्को ने 1966 में 8 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस घोषित किया। इसके बाद 1967 से यह दिवस दुनियाभर में मनाया जाने लगा।

समय के साथ साक्षरता की परिभाषा भी बदली है। आज साक्षर होने का मतलब सिर्फ अपना नाम लिख लेना नहीं है। जानकारी को समझना, सही और गलत सूचना में अंतर करना, डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल करना और बदलती दुनिया के साथ सीखते रहना भी आधुनिक साक्षरता का हिस्सा है।

इस दिन का उद्देश्य 

विश्व साक्षरता दिवस का उद्देश्य लोगों को यह समझाना है कि शिक्षा सिर्फ स्कूल की चारदीवारी तक सीमित रहने वाला विषय नहीं है। शिक्षा व्यक्ति के अधिकारों, आत्मनिर्भरता और सम्मान से जुड़ी हुई है। इस दिन दुनिया भर में यह संदेश दिया जाता है कि हर बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले। जो वयस्क शिक्षा से वंचित रह गए हैं, उन्हें सीखने का अवसर मिले। लड़कियों और महिलाओं की शिक्षा को बढ़ावा मिले। आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों तक शिक्षा पहुंचे। डिजिटल दौर में डिजिटल साक्षरता को बढ़ाया जाए और शिक्षा को रोजगार तथा जीवन कौशल से जोड़ा जाए।

शिक्षा व्यक्ति को दूसरों पर निर्भर रहने के बजाय अपने फैसले खुद लेने का आत्मविश्वास देती है। वह अपने अधिकारों को समझता है, सवाल पूछता है और अपने भविष्य को लेकर बेहतर निर्णय ले पाता है। इसलिए शिक्षा सिर्फ नौकरी पाने का माध्यम नहीं है। यह व्यक्ति को सोचने, समझने और अपने जीवन को दिशा देने की क्षमता देती है।

भारत में शिक्षा: लंबा सफर लेकिन मंजिल अभी बाकी

भारत जैसे विशाल और विविधता वाले देश में शिक्षा का विस्तार अपने आप में एक बड़ी चुनौती रहा है। आज देश के लगभग हर हिस्से में स्कूलों और उच्च शिक्षण संस्थानों का नेटवर्क मौजूद है। बच्चों को स्कूल तक लाने, लड़कियों की शिक्षा बढ़ाने, स्कूलों में सुविधाएं सुधारने और डिजिटल माध्यमों से शिक्षा पहुंचाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के जरिए शिक्षा को अधिक समग्र, कौशल आधारित और विद्यार्थी केंद्रित बनाने पर जोर दिया गया है। वहीं स्कूल शिक्षा से जुड़े आंकड़ों को समझने के लिए यूडीआईएसई प्लस जैसे डिजिटल डेटा सिस्टम का इस्तेमाल किया जा रहा है। हालांकि तस्वीर फिर भी पूरी तरह संतोषजनक नहीं है। कई जगहों पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक समान पहुंच, शिक्षकों की उपलब्धता, स्कूल छोड़ने की समस्या, ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में संसाधनों की कमी तथा डिजिटल असमानता जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं। यानी स्कूल तक पहुंच बनाना पहला कदम है, लेकिन अच्छी शिक्षा तक पहुंच सुनिश्चित करना अगली बड़ी चुनौती है।

सरकार के प्रयासों से आगे समाज की भी जिम्मेदारी

शिक्षा का विस्तार सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी नहीं हो सकता। एक बच्चे को स्कूल भेजने में परिवार की भूमिका है, उसे सीखने के लिए प्रेरित करने में शिक्षक की और शिक्षा का माहौल बनाने में पूरे समाज की। अगर कोई बच्चा आर्थिक कारणों से पढ़ाई छोड़ने को मजबूर है तो उसे वापस शिक्षा से जोड़ना समाज की भी जिम्मेदारी है। इसी तरह किसी वयस्क को पढ़ना-लिखना सीखने का अवसर देना भी साक्षर समाज की पहचान है। एक शिक्षित व्यक्ति सिर्फ अपना जीवन नहीं बदलता, वह अपने परिवार की अगली पीढ़ी की दिशा भी बदल सकता है।

शिक्षा बदलती है जीवन का नजरिया

शिक्षा का असर किताबों और परीक्षाओं से कहीं आगे जाता है। यह व्यक्ति के सोचने के तरीके को बदलती है। वह सवाल करना सिखाती है, तर्क करना सिखाती है और समस्याओं का समाधान खोजने की क्षमता भी विकसित करती है। शिक्षा रोजगार के अवसर बढ़ा सकती है, आर्थिक आत्मनिर्भरता को मजबूत कर सकती है और सामाजिक असमानताओं को कम करने में मदद कर सकती है। खासतौर पर महिलाओं की शिक्षा का असर सिर्फ एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि पूरे परिवार और आने वाली पीढ़ियों पर पड़ता है। यही कारण है कि शिक्षा को किसी खर्च के रूप में नहीं, बल्कि भविष्य में किया गया निवेश माना जाता है। आज विश्व साक्षरता दिवस पर हम सब ये प्रण ले सकते हैं कि अपने जीवन में शिक्षा को महत्व देंगे और दूसरों को भी पढ़ने के लिए प्रेरित करेंगे।