भारत के चंद्रयान-3 के बाद चीन की बड़ी तैयारी, चांद के सबसे रहस्यमयी इलाके में करेगा रिसर्च
इस मिशन के जरिए चीन चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर रोवर उतारकर वहां मौजूद पानी यानी बर्फ की तलाश करेगा। चांद का दक्षिणी ध्रुव वैज्ञानिकों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यहां मौजूद कुछ गड्ढों (क्रेटरों) में अरबों साल से सूरज की रोशनी नहीं पहुंची है। इन इलाकों में पानी के बर्फ के रूप में मौजूद होने की संभावना जताई जाती है।
New Delhi: चीन जल्द ही अपने सबसे महत्वाकांक्षी चंद्र मिशनों में से एक Chang’e-7 (चांगई-7) लॉन्च करने जा रहा है। इस मिशन के जरिए चीन चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर रोवर उतारकर वहां मौजूद पानी यानी बर्फ की तलाश करेगा।
चांद का दक्षिणी ध्रुव वैज्ञानिकों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यहां मौजूद कुछ गड्ढों (क्रेटरों) में अरबों साल से सूरज की रोशनी नहीं पहुंची है। इन इलाकों में पानी के बर्फ के रूप में मौजूद होने की संभावना जताई जाती है।
हालांकि, इस क्षेत्र में भारत पहले ही इतिहास रच चुका है। चंद्रयान-3 मिशन के जरिए भारत अगस्त 2023 में चांद के दक्षिणी ध्रुव के पास सफल लैंडिंग करने वाला दुनिया का पहला देश बन गया था। अब चीन इसी क्षेत्र में अपनी वैज्ञानिक पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।
क्यों खास है चीन का Chang’e-7 मिशन?
चीन का Chang’e-7 एक मानवरहित रोबोटिक चंद्र मिशन है, जिसे अब तक के सबसे जटिल और महत्वाकांक्षी चंद्र अभियानों में गिना जा रहा है।
इस मिशन का मुख्य उद्देश्य चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर मौजूद स्थायी रूप से अंधेरे क्रेटरों में पानी की बर्फ की खोज करना और उसकी मौजूदगी का नक्शा तैयार करना है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर चांद पर पानी की पर्याप्त मात्रा मिलती है तो भविष्य में वहां इंसानी बेस बनाने, ईंधन तैयार करने और लंबे समय तक अंतरिक्ष मिशनों को संचालित करने में मदद मिल सकती है।
शेकलटन क्रेटर के पास उतरेगा चीनी मिशन
Chang’e-7 मिशन को Long March-5 Y14 रॉकेट के जरिए चीन के वेनचांग स्पेस लॉन्च सेंटर से भेजा जाएगा। इसकी संभावित लॉन्च अवधि 24 अगस्त से 31 अगस्त 2026 के बीच बताई जा रही है।
मिशन चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर स्थित Shackleton Crater के किनारे उतरने की योजना बना रहा है। यह इलाका सौर मंडल के सबसे ठंडे क्षेत्रों में से एक माना जाता है, जहां तापमान करीब -203 डिग्री सेल्सियस तक गिर सकता है।
पहली बार चंद्र मिशन में भेजा जाएगा खास हॉपर
Chang’e-7 मिशन की सबसे बड़ी खासियत इसमें शामिल हॉपर (Hopper) है। यह यंत्र चंद्र सतह के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचकर पानी और खनिजों की खोज करेगा।
चीन का दावा है कि यह दुनिया का पहला ऐसा चंद्र मिशन होगा, जिसमें पानी की खोज के लिए विशेष रूप से डिजाइन किया गया हॉपर इस्तेमाल किया जाएगा।
कई देशों के उपकरण होंगे शामिल
इस मिशन में अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी देखने को मिलेगा। कई देशों और संस्थानों के वैज्ञानिक उपकरण Chang’e-7 में शामिल किए गए हैं।
इनमें शामिल हैं:
- इटली का लेजर रेट्रोरिफ्लेक्टर
- रूस का धूल संसूचक उपकरण
- स्विट्जरलैंड का रेडिएशन स्पेक्ट्रोमीटर
- हांगकांग विश्वविद्यालय और ILOA द्वारा विकसित कॉम्पैक्ट कैमरा ILO-C
यह कैमरा चंद्रमा की सतह से हमारी आकाशगंगा के गैलेक्टिक प्लेन की तस्वीरें लेने में सक्षम होगा।
चीन का बड़ा लक्ष्य: 2030 तक चांद पर इंसानी लैंडिंग
Chang’e-7 चीन के चंद्र अन्वेषण कार्यक्रम के चौथे चरण का हिस्सा है। चीन इस मिशन के जरिए भविष्य में 2030 तक चंद्रमा पर मानव मिशन भेजने की तैयारी कर रहा है।
इसके बाद प्रस्तावित Chang’e-8 मिशन (2028) के साथ मिलकर चीन अपने International Lunar Research Station (ILRS) के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ेगा।
चांद के दक्षिणी ध्रुव पर कौन-कौन देश भेज चुके हैं मिशन?
चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर पानी की खोज के लिए कई देशों ने प्रयास किए हैं, लेकिन अब तक ज्यादातर मिशन सफल नहीं हो पाए हैं।
भारत: चंद्रयान-3 ने रचा इतिहास
भारत का Chandrayaan-3 Mission अगस्त 2023 में चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र में सफलतापूर्वक उतरने वाला दुनिया का पहला मिशन बना।
प्रज्ञान रोवर ने चंद्र सतह के तापमान समेत कई महत्वपूर्ण वैज्ञानिक आंकड़े जुटाए। इससे दक्षिणी ध्रुव की मिट्टी और वहां मौजूद परिस्थितियों को समझने में बड़ी मदद मिली।
इससे पहले भारत के Chandrayaan-1 Mission ने भी चंद्रमा के ध्रुवीय क्षेत्रों में जल-बर्फ की मौजूदगी के संकेत दिए थे।
रूस: Luna-25 मिशन हुआ था असफल
रूस ने 2023 में Luna-25 Mission के जरिए चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतरने की कोशिश की थी।
लेकिन तकनीकी खराबी के कारण यह यान नियंत्रण खो बैठा और चंद्र सतह पर दुर्घटनाग्रस्त हो गया। मिशन कोई वैज्ञानिक डेटा हासिल नहीं कर पाया।
अमेरिका: ऑर्बिटर और इम्पैक्ट मिशनों से खोज
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी NASA ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव का अध्ययन कई मिशनों के जरिए किया है।
Clementine (1994) और Lunar Prospector (1998) मिशनों ने चंद्रमा पर पानी की बर्फ के संकेत खोजे थे।
इसके बाद 2009 में NASA के LCROSS Mission ने चंद्रमा के एक अंधेरे क्रेटर में रॉकेट के हिस्से को टकराया। इससे उठी धूल के विश्लेषण में पानी की मौजूदगी की पुष्टि हुई थी।
चांद की रेस में क्यों अहम है दक्षिणी ध्रुव?
चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव अब दुनिया की प्रमुख अंतरिक्ष शक्तियों के लिए नई रेस का केंद्र बन चुका है। यहां मौजूद पानी भविष्य में इंसानी अंतरिक्ष अभियानों की दिशा बदल सकता है।
भारत ने जहां इस क्षेत्र में पहला सफल कदम रखा है, वहीं चीन, अमेरिका और अन्य देश अब चांद पर स्थायी मौजूदगी बनाने की तैयारी में जुटे हैं।