Strait of Hormuz Dispute: ईरान ने भारत की धरती से अमेरिका को दी चेतावनी, जानिए जलमार्ग खोलने की क्या रखी शर्तें
मध्य पूर्व में जारी सैन्य संघर्ष के कारण दुनिया का अहम ऊर्जा मार्ग स्ट्रेट ऑफ होर्मुज लगभग ठप हो चुका है, जिससे भारत समेत कई देशों में पेट्रोलियम पदार्थों की किल्लत बढ़ गई है। इस बीच, ब्रिक्स सम्मेलन में आए ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने साफ किया है कि अमेरिका द्वारा नाकेबंदी और सैन्य गतिविधियां बंद किए जाने के बाद ही इस जलमार्ग को दोबारा खोला जा सकता है।
New Delhi: मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) में चल रहे सैन्य संघर्ष का असर अब पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर दिखने लगा है। दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ‘एनर्जी कॉरिडोर’ (ऊर्जा मार्ग) माने जाने वाले ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ में व्यापारिक जहाजों की आवाजाही लगभग ठप हो गई है। यह समुद्री रास्ता बहुत बुरी तरह प्रभावित हुआ है, जिसके कारण भारत समेत दुनिया के कई देशों में पेट्रोल-डीजल जैसे पेट्रोलियम पदार्थों की किल्लत होने लगी है। इस बड़े संकट के बीच ईरान ने इस अहम जलमार्ग को दोबारा खोलने के संकेत दिए हैं, लेकिन इसके लिए उसने अमेरिका के सामने कुछ बेहद सख्त शर्तें रख दी हैं।
अमेरिका के लिए ईरान की कड़ी शर्तें
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए भारत की यात्रा पर आए ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने एक मीडिया इंटरव्यू में अपनी स्थिति साफ की। उन्होंने स्पष्ट किया कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को तब तक पूरी तरह से खोला नहीं जा सकता, जब तक अमेरिका ईरान पर अपना दबाव कम नहीं करता।
होर्मुज में ईरान की नई समुद्री नाकेबंदी: अब जहाजों को गुजरने के लिए तेहरान को देना होगा टैक्स
ईरान की सबसे बड़ी शर्त यह है कि अमेरिका उसके खिलाफ अपनी सैन्य गतिविधियां और आर्थिक नाकेबंदी को तुरंत बंद करे। राष्ट्रपति पेजेश्कियान ने बताया कि अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंधों का सीधा असर आम नागरिकों पर पड़ रहा है। देश में बेरोजगारी बढ़ रही है और संसाधनों के अभाव में मरीजों की जान जा रही है। उन्होंने कहा कि अमेरिका जब सैन्य ताकत से अपने मनसूबे पूरे नहीं कर पाया, तो वह अब आर्थिक दबाव बनाकर आम जनता को परेशान कर रहा है। जब तक अमेरिका यह रणनीति नहीं छोड़ता, रास्ता नहीं खुलेगा।
‘हमने शुरुआत नहीं की, हम केवल जवाब दे रहे हैं’
ईरानी राष्ट्रपति ने इस बात पर खास जोर दिया कि मौजूदा विवाद की शुरुआत न तो ईरान ने की थी और न ही हिज्बुल्लाह ने। उन्होंने कहा कि ईरान केवल अपने खिलाफ हुए अमेरिकी हमलों का जवाब देने को मजबूर हुआ है। उन्होंने अमेरिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि वह एक तरफ तो इलाके में हथियार ला रहा है और दूसरी तरफ क्षेत्रीय रास्तों को रोक रहा है।
पेजेश्कियान ने सख्त लहजे में कहा, “अगर हम जिंदा हैं, तो हमें अपने ऊपर हुए हमलों का जवाब देना ही होगा। मरने के बाद तो हम जवाब नहीं दे सकते।” उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि समुद्री रास्तों पर दबाव के बावजूद ईरान अमेरिकी प्रतिबंधों के आगे घुटने टेकने वाला नहीं है। उनका मानना है कि समुद्री रास्ते व्यापार के लिए आसान जरूर हैं, लेकिन अगर उन्हें रोका जाता है तो ईरान हार नहीं मानेगा।
जलमार्ग पर नियंत्रण और फीस की नई मांग
ईरान अब यह मांग कर रहा है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर उसके नियंत्रण को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दी जाए। साथ ही, ईरान इस रास्ते से गुजरने वाले सभी व्यापारिक जहाजों से फीस वसूलना चाहता है। हालांकि, अमेरिका ने ईरान की इस मांग को पूरी तरह खारिज कर दिया है।
इस अहम समुद्री रास्ते को फिर से सुचारू रूप से चलाने के लिए ईरान अब ओमान के साथ बातचीत कर रहा है, जो स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के दूसरे छोर पर स्थित है। ईरान ओमान के साथ मिलकर इस जलमार्ग के लिए एक विशेष समुद्री ढांचा और नियम तैयार करना चाहता है। ओमान खुद भी इस मुद्दे पर मध्य पूर्व के अन्य देशों के साथ चर्चा कर रहा है।
भारत के लिए चिंता और चाबहार पर खास चर्चा
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का बंद होना भारत के लिए एक बड़ी चिंता का विषय है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों (एनर्जी इंपोर्ट) का एक बहुत बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से खरीदता है, जो इसी समुद्री रास्ते से होकर भारत पहुंचता है।
इस संकट के बीच, ईरान के राष्ट्रपति ने ब्रिक्स सम्मेलन से अलग भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ एक द्विपक्षीय बैठक भी की। दोनों देशों के शीर्ष नेताओं ने आर्थिक सहयोग बढ़ाने के तरीकों पर विस्तार से चर्चा की। इसके साथ ही, ईरान के चाबहार बंदरगाह में भारत के निवेश और दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी को लेकर भी अहम बातचीत हुई।