COPD मरीजों के लिए नई उम्मीद: Dupilumab इंजेक्शन से गंभीर अटैक का खतरा हो सकता है कम
ब्रिटेन में पहली बार सीओपीडी (क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज) के मरीजों को डुपिलुमैब इंजेक्शन दिया गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह नई दवा बीमारी के गंभीर अटैक को लगभग 33 प्रतिशत तक कम करने में मदद कर सकती है और मरीजों की जीवन गुणवत्ता में सुधार ला सकती है।
New Delhi: फेफड़ों से जुड़ी गंभीर बीमारी क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (COPD) के इलाज में एक नई उम्मीद दिखाई दी है। ब्रिटेन में पहली बार इस बीमारी से पीड़ित मरीजों को डुपिलुमैब (Dupilumab) इंजेक्शन दिया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह दवा बीमारी के अचानक गंभीर होने (एक्सासरबेशन) के मामलों को लगभग 33 प्रतिशत तक कम कर सकती है। हालांकि यह COPD का स्थायी इलाज नहीं है, लेकिन इसे उपचार के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।
दुनियाभर में बड़ी स्वास्थ्य चुनौती है COPD
फेफड़ों और श्वसन तंत्र से जुड़ी बीमारियां दुनिया में मौत के प्रमुख कारणों में शामिल हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, दुनिया भर में करीब 56.9 करोड़ लोग विभिन्न श्वसन रोगों से प्रभावित हैं और हर साल एक करोड़ से अधिक लोगों की इन बीमारियों के कारण मौत होती है। इन बीमारियों में अस्थमा, COPD, निमोनिया, फेफड़ों का कैंसर और टीबी प्रमुख हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक वायु प्रदूषण, धूम्रपान और कुछ आनुवंशिक कारण इन रोगों का खतरा बढ़ाते हैं।
क्या है COPD?
COPD एक ऐसी बीमारी है जिसमें फेफड़ों की सांस लेने वाली नलियों में सूजन आ जाती है और वे धीरे-धीरे संकरी होने लगती हैं। इसके कारण मरीज को सांस लेने में परेशानी, लगातार खांसी, बलगम और सीने में जकड़न जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। समय के साथ यह बीमारी गंभीर रूप ले सकती है और कई बार मरीज की हालत अचानक बिगड़ जाती है। डॉक्टर इस स्थिति को एक्सासरबेशन कहते हैं। विश्व स्वास्थ्य संबंधी आंकड़ों के अनुसार, दुनिया में 21 करोड़ से अधिक लोग COPD से प्रभावित हैं। यह बीमारी हर साल लगभग 37 लाख लोगों की जान लेती है और इनमें से 90 प्रतिशत से अधिक मौतें निम्न और मध्यम आय वाले देशों में होती हैं।
डुपिलुमैब इंजेक्शन कैसे करेगा मदद?
विशेषज्ञों के अनुसार, डुपिलुमैब शरीर में मौजूद उन विशेष प्रोटीन पर असर करता है जो फेफड़ों में सूजन बढ़ाने का काम करते हैं। इससे सांस की नलियों की सूजन कम होती है, बलगम बनने की मात्रा घटती है और मरीज को पहले की तुलना में अधिक आसानी से सांस लेने में मदद मिलती है। डॉक्टरों का कहना है कि यह इंजेक्शन बीमारी के गंभीर अटैक की संभावना को करीब एक-तिहाई यानी 33 प्रतिशत तक कम कर सकता है। साथ ही इससे फेफड़ों की कार्यक्षमता बेहतर होने और अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत भी कम पड़ सकती है।
ब्रिटेन में पहली बार मरीजों को दिया गया इंजेक्शन
ब्रिटेन की स्वास्थ्य संस्था नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ एंड केयर एक्सीलेंस (NICE) ने पिछले वर्ष इस दवा को मंजूरी दी थी। इसके बाद हाल ही में एनएचएस (National Health Service) के तहत पहली बार COPD मरीजों को यह इंजेक्शन दिया गया। यह दवा हर दो सप्ताह में एक बार इंजेक्शन के रूप में दी जाती है। अभी तक इस बीमारी का इलाज मुख्य रूप से इनहेलर और स्टेरॉयड दवाओं के जरिए किया जाता रहा है।
पहले मरीज ने क्या कहा?
इस नई दवा का पहला डोज 67 वर्षीय पैट्रिक रेगन को दिया गया, जो दक्षिण-पूर्वी लंदन के कैटफोर्ड इलाके के निवासी हैं। उन्हें करीब 15 वर्ष पहले COPD का पता चला था। पैट्रिक ने कहा कि यदि इस इंजेक्शन से उन्हें थोड़ी भी राहत मिलती है और सांस लेने में आसानी होती है, तो यह उनके लिए बड़ी बात होगी। उन्होंने बताया कि बीमारी की वजह से उनकी रोजमर्रा की जिंदगी काफी प्रभावित हुई है और अब पहले की तरह परिवार के साथ घूमना-फिरना भी आसान नहीं रहा।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने क्या कहा?
ब्रिटेन की स्वास्थ्य संस्था NICE में दवाओं के मूल्यांकन की निदेशक हेलेन नाइट के अनुसार, डुपिलुमैब COPD मरीजों के लिए एक प्रभावी उपचार विकल्प साबित हो सकता है। शुरुआती परिणामों में यह दवा बीमारी के गंभीर दौर को कम करने और फेफड़ों की कार्यक्षमता सुधारने में मददगार दिखाई दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भविष्य में बड़े स्तर पर भी इसके सकारात्मक परिणाम मिलते हैं, तो इससे लाखों मरीजों की जीवन गुणवत्ता बेहतर हो सकती है और स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ने वाला आर्थिक बोझ भी कम होगा।
स्वस्थ जीवनशैली भी है जरूरी
डॉक्टरों का कहना है कि COPD के मरीजों के लिए नियमित व्यायाम, संतुलित आहार, धूम्रपान से दूरी और प्रदूषण से बचाव बेहद जरूरी है। ये उपाय बीमारी को गंभीर होने से रोकने में मदद कर सकते हैं। हालांकि, शोध बताते हैं कि COPD का पता चलने के बाद कई मरीज औसतन लगभग 10 वर्ष तक ही जीवित रह पाते हैं। ऐसे में डुपिलुमैब जैसी नई दवाएं भविष्य में इस बीमारी के इलाज की दिशा बदल सकती हैं।