India-US Trade: ट्रंप के नए फैसले ने बढ़ाई भारत की टेंशन, आखिर किस पर पड़ सकता है सबसे बड़ा असर?
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नए टैरिफ ऐलान ने भारत के लिए नई चिंता खड़ी कर दी है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि इसका असर सिर्फ कारोबार तक रहेगा या आम लोगों की जेब और दवाओं की कीमतों तक भी पहुंचेगा।
New Delhi: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर ऐसा फैसला लिया है जिसने भारत समेत कई देशों की चिंता बढ़ा दी है। ट्रंप प्रशासन ने करीब 60 देशों पर 10 से 12.5 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ़ लगाने का ऐलान किया है। भारत से अमेरिका जाने वाले कई उत्पादों पर भी 10 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लगाया जाएगा।
अमेरिका का दावा है कि जिन देशों से ये सामान आ रहे हैं, उनमें कुछ उत्पाद कथित तौर पर जबरन मजदूरी से बनाए जाते हैं। इसी आधार पर यह कदम उठाया गया है। हालांकि भारत की ओर से अभी तक इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
सबसे ज्यादा चिंता फार्मा सेक्टर में
इस फैसले का सबसे बड़ा असर भारत के फार्मा सेक्टर पर पड़ सकता है। भारत दुनिया में सबसे ज्यादा जेनेरिक दवाएं बनाने वाले देशों में शामिल है और अमेरिका भारतीय दवा कंपनियों का सबसे बड़ा बाजार माना जाता है। स्थिति तब और गंभीर हो गई जब ट्रंप ने पहले ही संकेत दे दिए थे कि आने वाले वर्षों में अमेरिका में आयात होने वाली जेनेरिक दवाओं पर 100 प्रतिशत से लेकर 200 प्रतिशत तक टैरिफ़ लगाया जा सकता है। अगर ऐसा होता है तो भारतीय कंपनियों के लिए अमेरिका में कारोबार करना पहले की तुलना में काफी महंगा हो जाएगा।
ये भी पढ़ें- ‘हर एक शहीद के बदले एक अमेरिकी सैनिक ढेर करेंगे’, SCO सम्मेलन में अमेरिका की दादागिरी पर भड़का ईरान
भारतीय कंपनियों की बढ़ी चिंता
टैरिफ की घोषणा के बाद कई भारतीय दवा कंपनियों के शेयरों में गिरावट देखी गई। कंपनियों को डर है कि अगर अमेरिका में ज्यादा टैक्स देना पड़ा तो उनकी लागत बढ़ जाएगी और मुनाफा कम हो जाएगा। भारत हर साल बड़ी मात्रा में दर्द निवारक, एंटीबायोटिक, कैंसर और कई दूसरी जरूरी जेनेरिक दवाएं अमेरिका भेजता है। इन दवाओं की खासियत यह होती है कि ये ब्रांडेड दवाओं जितनी प्रभावी होती हैं, लेकिन कीमत काफी कम रहती है।
अगर इन पर भारी टैरिफ लागू होता है तो कंपनियों को या तो कीमत बढ़ानी होगी या फिर मुनाफे में कटौती करनी पड़ेगी।
क्या अमेरिका में ही बनानी पड़ेंगी दवाएं?
ट्रंप प्रशासन की योजना यह भी है कि विदेशी कंपनियां अमेरिका में ही उत्पादन शुरू करें। इसे रीशोरिंग कहा जाता है। लेकिन भारत की ज्यादातर फार्मा कंपनियों के लिए अमेरिका में फैक्ट्री लगाना आसान नहीं होगा। इसके लिए भारी निवेश, नई मशीनें और लंबी प्रक्रिया की जरूरत होगी। छोटी और मध्यम कंपनियों के लिए यह चुनौती और बड़ी साबित हो सकती है।
कच्चे माल पर भी बना हुआ है संशय
फिलहाल यह साफ नहीं है कि टैरिफ सिर्फ तैयार दवाओं पर लगेगा या दवाएं बनाने में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल यानी एपीआई पर भी लागू होगा। अगर एपीआई पर भी शुल्क लगाया गया तो उत्पादन लागत और ज्यादा बढ़ सकती है। इसका असर केवल भारतीय कंपनियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक सप्लाई चेन पर भी दिखाई दे सकता है।
ये भी पढ़ें- Commonwealth Games में झंडू कुमार ने रचा इतिहास, भारत को दिलाया पहला मेडल
अमेरिका के लिए भी आसान नहीं होगा यह फैसला
विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले का नुकसान सिर्फ भारत को नहीं बल्कि अमेरिका को भी झेलना पड़ सकता है। अमेरिका में इस्तेमाल होने वाली बड़ी संख्या में जेनेरिक दवाएं भारत से आती हैं। अगर इनकी कीमत बढ़ती है या सप्लाई कम होती है तो वहां मरीजों को सस्ती दवाएं मिलना मुश्किल हो सकता है। ऐसी स्थिति में इलाज का खर्च बढ़ सकता है और अस्पतालों पर भी दबाव बढ़ने की आशंका है।
व्यापारिक रिश्तों पर भी पड़ सकता है असर
भारत और अमेरिका के बीच पिछले कुछ वर्षों में व्यापार लगातार बढ़ा है। दोनों देश कई क्षेत्रों में एक-दूसरे के महत्वपूर्ण साझेदार हैं। लेकिन अगर लगातार टैरिफ बढ़ाए जाते रहे तो दोनों देशों के व्यापारिक संबंधों पर असर पड़ सकता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि बातचीत के जरिए समाधान निकालना दोनों देशों के हित में होगा।