1971 की हार याद दिलाकर सेना को घेरा, फजलुर रहमान बोले- ताकत के दावे पहले भी हुए थे
पाकिस्तान के वरिष्ठ नेता मौलाना फजलुर रहमान ने सेना प्रमुख आसिम मुनीर और सैन्य प्रतिष्ठान पर निशाना साधते हुए 1971 युद्ध की याद दिलाई है। उन्होंने कहा कि लंबे समय तक जारी हिंसा और खून-खराबा भविष्य में बड़े बदलाव ला सकता है। साथ ही उन्होंने संसद की शक्तियों के केंद्रीकरण पर भी सवाल उठाए हैं।
New Delhi: पाकिस्तान में सेना और सरकार के बीच चल रही खींचतान के बीच वरिष्ठ नेता मौलाना फजलुर रहमान ने सैन्य प्रतिष्ठान और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने 1971 के युद्ध की याद दिलाते हुए कहा कि सिर्फ ताकत और आखिरी दम तक लड़ने के दावे करने से हकीकत नहीं बदलती। अगर खून बहता रहा तो इसका असर देश की सीमाओं और नक्शे पर भी पड़ सकता है।
जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम (फ) के प्रमुख फजलुर रहमान ने पेशावर में आयोजित एक सम्मेलन में पाकिस्तान के मौजूदा हालात पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि देश की जनता महंगाई, असुरक्षा और परेशानियों से जूझ रही है, ऐसे समय में सत्ता का प्रदर्शन और ताकत के दावे किसी काम के नहीं हैं।
1971 की जंग और ढाका आत्मसमर्पण का जिक्र
फजलुर रहमान ने अपने भाषण में साल 1971 के युद्ध का जिक्र करते हुए सैन्य नेतृत्व को इतिहास से सबक लेने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि उस समय भी पाकिस्तानी सेना की ओर से बड़े-बड़े दावे किए गए थे कि आखिरी सांस तक लड़ाई जारी रहेगी, लेकिन अंत में ढाका में आत्मसमर्पण करना पड़ा।
उन्होंने तत्कालीन सैन्य शासक जनरल याह्या खान के बयानों को याद करते हुए कहा कि उस दौर में भी जनता ने ऐसे ही दावे सुने थे। लेकिन 16 दिसंबर 1971 को करीब 93 हजार पाकिस्तानी सैनिकों के आत्मसमर्पण के साथ युद्ध खत्म हुआ और पाकिस्तान का पूर्वी हिस्सा अलग होकर बांग्लादेश बन गया।
‘जनता परेशान है, फिर ये ताकत किसलिए?’
JUI-F प्रमुख ने पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व से सवाल करते हुए कहा कि जब आम लोग मुश्किल हालात से गुजर रहे हैं तो देश को लगातार तनाव और संघर्ष की ओर क्यों धकेला जा रहा है। उन्होंने कहा कि सत्ता की ताकत दिखाने से पहले जनता की परेशानियों को समझना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि दशकों से जारी हिंसा और संघर्ष ने पूरे क्षेत्र को नुकसान पहुंचाया है। अफगानिस्तान से लेकर क्षेत्रीय संघर्षों तक लगातार खून बहता रहा है। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि इतिहास बताता है कि लंबे समय तक जारी हिंसा कई बार बड़े बदलावों का कारण बनती है।
संसद की शक्तियों पर भी उठाए सवाल
फजलुर रहमान ने सेना प्रमुख आसिम मुनीर पर सत्ता के केंद्रीकरण का आरोप लगाते हुए कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका कमजोर नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि सेना प्रमुख, चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज या फील्ड मार्शल बनने पर किसी को आपत्ति नहीं है, लेकिन संसद और संघीय सरकार की शक्तियां किसी एक व्यक्ति के हाथ में नहीं जानी चाहिए।
उन्होंने आशंका जताई कि अगर यही स्थिति जारी रही तो भविष्य में कानून बनाने और संविधान में बदलाव जैसी प्रक्रियाओं में संसद की भूमिका प्रभावित हो सकती है। उन्होंने विपक्षी दलों से भी संसद के भीतर एकजुट होकर लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा करने की अपील की।
पाकिस्तान में बढ़ रही राजनीतिक हलचल
फजलुर रहमान का यह बयान ऐसे समय आया है जब पाकिस्तान में सेना की भूमिका और राजनीतिक फैसलों को लेकर बहस तेज है। उनके बयान ने देश की राजनीति में नई चर्चा शुरू कर दी है और इसे सैन्य प्रतिष्ठान के खिलाफ एक बड़ा राजनीतिक हमला माना जा रहा है।