मोहन भागवत का शक्तिशाली देशों पर तंज, बोले – ‘ताकत के नशे में चूर होकर किसी भी देश को हथियाने से…’, पढ़ें खबर
विश्व पटल पर आज जहाँ कुछ शक्तिशाली राष्ट्रों की मनमानी और बल प्रदर्शन अपने चरम पर है, वहीं भारत की भूमिका और उसके भविष्य को लेकर सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने एक गहरा चिंतन प्रस्तुत किया है। दरअसल उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि दुनिया को अब भारत की आवश्यकता है, क्योंकि भारत ही
विश्व पटल पर आज जहाँ कुछ शक्तिशाली राष्ट्रों की मनमानी और बल प्रदर्शन अपने चरम पर है, वहीं भारत की भूमिका और उसके भविष्य को लेकर सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने एक गहरा चिंतन प्रस्तुत किया है। दरअसल उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि दुनिया को अब भारत की आवश्यकता है, क्योंकि भारत ही वह देश है जो सबको साथ लेकर चलने की सनातन सोच रखता है। यह विचार ऐसे समय में सामने आए हैं जब वैश्विक व्यवस्था में अस्थिरता और संघर्ष का बोलबाला है।
जानिए डॉ. मोहन भागवत ने क्या कहा?
दरअसल डॉ. भागवत ने गुरुवार को बिना किसी का नाम लिए, बल सम्पन्न देशों की उस प्रवृत्ति पर तीखा तंज कसा, जहाँ वे अपनी शक्ति के मद में चूर होकर मनमानी करते हैं। उन्होंने कहा कि हम देखते हैं कि बल सम्पन्न देश अपनी ताकत के नशे में चूर होकर किसी भी देश को हथियाने से नहीं हिचकते, या फिर किसी संप्रभु राष्ट्र पर बम गिराकर विनाश करने में भी उन्हें कोई संकोच नहीं होता। यही नहीं, वैश्विक तेल आपूर्ति जैसी महत्वपूर्ण व्यवस्थाओं को भी अपनी सनक के अनुसार कभी भी बंद कर देना, यह सब आज की विश्व राजनीति की कड़वी सच्चाई बन चुकी है। सरसंघचालक ने इस विडंबना पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ऐसे समय में विश्व यह अपेक्षा करता है कि भारत जब शक्ति सम्पन्न होगा, तब वह ऐसी मनमानी नहीं करेगा, बल्कि समूचे विश्व को साथ लेकर आगे बढ़ेगा और सद्भाव का मार्ग प्रशस्त करेगा। उन्होंने अमेरिका पर भी परोक्ष रूप से तंज कसते हुए उसकी इस प्रवृत्ति को रेखांकित किया।
भारत के गौरवशाली अतीत पर विचार व्यक्त किए
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर आयोजित कार्यकर्ता प्रशिक्षण वर्ग में अपने संबोधन के दौरान, डॉ. मोहन भागवत ने भारत के गौरवशाली अतीत और उसकी हजार साल की गुलामी पर भी गहन विचार व्यक्त किए। उन्होंने प्रश्न उठाया कि संस्कृति, सभ्यता, ज्ञान-विज्ञान और आंतरिक शक्ति से परिपूर्ण होने के बावजूद भी आखिर ऐसी परिस्थिति क्यों आई कि भारत को एक हजार वर्षों की पराधीनता झेलनी पड़ी? यह एक ऐसी पीड़ादायक सच्चाई है, जिस पर प्रत्येक भारतीय को चिंतन करना आवश्यक है।
जड़ों से जुड़कर अपने स्वाभिमान को जगाना होगा: डॉ. भागवत
वहीं डॉ. भागवत ने दृढ़ता से कहा कि जिन्होंने हमें गुलाम बनाया, वे न तो संख्या में हमसे अधिक थे और न ही किसी भी मायने में हमसे श्रेष्ठ थे। वे तो बहुत दूर से आकर हम पर हावी हुए और कई मामलों में तो वे हमसे बदतर ही थे। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यह हमारी अपनी कुछ अच्छी बातें थीं, जिन्हें हमने समय के साथ संभालकर नहीं रखा। हम अपनी उन महत्वपूर्ण तैयारियों को भूल गए, जिनके बल पर हम अपनी स्वतंत्रता की रक्षा कर सकते थे और अपनी पहचान बनाए रख सकते थे। उन्होंने आह्वान किया कि उस खोई हुई तैयारी को हमें पुनः प्राप्त करना होगा, अपनी जड़ों से जुड़कर अपने स्वाभिमान को जगाना होगा और अपनी आंतरिक शक्ति को पहचानना होगा। यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम अपनी उन कमियों को दूर करें, जिनके कारण अतीत में हमें ऐसी विषम परिस्थितियां झेलनी पड़ीं।