ग्रिड ठप्प हुआ तब भी काम करेंगे अमेरिकी हथियार! 5 सैन्य ठिकानों पर लगेंगे परमाणु माइक्रोरिएक्टर
अमेरिकी सेना 5 सैन्य ठिकानों पर 2.2 अरब डॉलर की लागत से परमाणु माइक्रोरिएक्टर लगाएगी। बिना बाहरी बिजली ग्रिड के सेना को मिलेगी निर्बाध ऊर्जा। जानिए जेनस प्रोग्राम, इसके फायदे और सुरक्षा से जुड़े सभी नियम सरल भाषा में।
Washington: युद्ध या आपातकाल के दौरान साइबर हमले और तकनीकी खराबी से अगर पूरा राष्ट्रीय बिजली ग्रिड ठप्प भी हो जाए, तब भी अमेरिकी सेना की तैयारियां प्रभावित नहीं होंगी। अमेरिकी सेना ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को अभेद्य बनाने के लिए एक बड़ा और अनूठा कदम उठाया है। न्यूयॉर्क से लेकर टेक्सस तक फैले पांच प्रमुख सैन्य ठिकानों पर परमाणु माइक्रोरिएक्टर (Nuclear Microreactors) तैनात करने की योजना बनाई गई है।
2.2 अरब डॉलर का महाप्लान
सेना के ‘जेनस प्रोग्राम’ (JANUS Program) के तहत इस पूरी परियोजना पर 5 सालों में 2.2 अरब डॉलर खर्च किए जाएंगे। इसके लिए सेना ने 5 निजी कंपनियों का चयन किया है, जो इन माइक्रोरिएक्टरों का निर्माण, संचालन और देखभाल करेंगी। सेना का लक्ष्य केवल 5 ठिकानों तक सीमित रहना नहीं है, बल्कि भविष्य में ऐसे 20 से अधिक माइक्रोरिएक्टर स्थापित करने की योजना है।
पारंपरिक बिजली ग्रिड से मिलेगी आजादी
अक्सर सैन्य ठिकानों को आम नागरिक बिजली ग्रिड से बिजली मिलती है, जिससे साइबर हमलों या प्राकृतिक आपदाओं के दौरान सुरक्षा जोखिम बना रहता है। ये माइक्रोरिएक्टर सेना को पूरी तरह ‘ऊर्जा आत्मनिर्भर’ बनाएंगे। सेना के सचिव डैन ड्रिस्कॉल के अनुसार, इस कदम से बाहरी ग्रिड पर निर्भरता खत्म होगी और अमेरिकी सेना को किसी भी परिस्थिति में निर्बाध ऊर्जा मिलती रहेगी।
सालों तक नहीं पड़ेगी री-फ्यूलिंग की जरूरत
इन माइक्रोरिएक्टरों की सबसे बड़ी खासियत इनका छोटा आकार और लंबी क्षमता है। इन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना आसान है और इन्हें कई वर्षों तक दोबारा ईंधन (Refueling) देने की आवश्यकता नहीं होती। डेटा सेंटरों और आधुनिक सैन्य हथियारों की बढ़ती बिजली मांग को पूरा करने के लिए यह तकनीक बेहद कारगर साबित होगी।
सुरक्षा और रेडियोधर्मी कचरे का समाधान
आलोचकों द्वारा सुरक्षा और महंगे खर्च पर उठाए गए सवालों का जवाब देते हुए अधिकारियों ने साफ किया कि ये रिएक्टर स्व-संचालित और पूरी तरह सुरक्षित हैं। किसी भी खराबी की स्थिति में ये अपने आप बंद हो जाएंगे। साथ ही, रेडियोधर्मी कचरे को सुरक्षित तरीके से हटाने के लिए अमेरिकी ऊर्जा विभाग (DoE) के साथ समझौता किया जा रहा है, ताकि सैन्य ठिकानों पर कचरा जमा न हो।