आज होगा RBI मॉनेटरी पॉलिसी का ऐलान, रेपो रेट पर आ सकता है बड़ा फैसला, इसपर रहेगा फोकस
आज भारतीय रिजर्व बैंक की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी की तीन दिवसीय बैठक के महत्वपूर्ण फैसलों का ऐलान होने वाला है। वहीं इस घोषणा पर बाजार और आम जनता दोनों की गहरी निगाहें टिकी हुई हैं, क्योंकि इससे सीधे तौर पर उनकी आर्थिक गतिविधियों पर असर पड़ेगा। जानकारों और बाजार विशेषज्ञों का अनुमान है कि केंद्रीय
आज भारतीय रिजर्व बैंक की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी की तीन दिवसीय बैठक के महत्वपूर्ण फैसलों का ऐलान होने वाला है। वहीं इस घोषणा पर बाजार और आम जनता दोनों की गहरी निगाहें टिकी हुई हैं, क्योंकि इससे सीधे तौर पर उनकी आर्थिक गतिविधियों पर असर पड़ेगा। जानकारों और बाजार विशेषज्ञों का अनुमान है कि केंद्रीय बैंक इस बार रेपो रेट को मौजूदा 5.25% पर ही बरकरार रखने का निर्णय ले सकता है। हालांकि, कुछ विशेषज्ञ ऐसे भी हैं जो रुपए पर लगातार बढ़ते दबाव और बढ़ती महंगाई के जोखिम को देखते हुए ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावना भी जता रहे हैं।
दरअसल इससे पहले भी अप्रैल महीने में हुई मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी की बैठक में रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं किया गया था, इसे यथावत रखा गया था। भारतीय रिजर्व बैंक ने आखिरी बार दिसंबर 2025 में ब्याज दर में 0.25% की कमी की थी, जिसके बाद रेपो रेट 5.25% पर आ गया था। रेपो रेट वह प्रमुख दर होती है जिस पर भारतीय रिजर्व बैंक देश के अन्य वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकालिक कर्ज उपलब्ध कराता है। जब आरबीआई रेपो रेट में कमी करता है, तो बैंकों को मिलने वाला यह कर्ज सस्ता हो जाता है। इस लाभ को बैंक अक्सर अपने ग्राहकों तक पहुंचाते हैं, जिससे उन्हें मिलने वाले विभिन्न प्रकार के लोन जैसे होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन की ब्याज दरें भी कम हो जाती हैं।
मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी क्या होती है?
वहीं भारतीय रिजर्व बैंक की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी की बैठकें हर दो महीने में आयोजित की जाती हैं। इस कमेटी में कुल 6 सदस्य होते हैं। इनमें से तीन सदस्य भारतीय रिजर्व बैंक की तरफ से होते हैं, जबकि बाकी के तीन सदस्यों की नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा की जाती है। यह कमेटी देश की आर्थिक स्थिति, महंगाई दर और अन्य महत्वपूर्ण वित्तीय संकेतकों का गहन विश्लेषण करती है और उसके आधार पर मौद्रिक नीति संबंधी फैसले लेती है। वित्त वर्ष 2026-27 के लिए मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी की कुल 6 बैठकें निर्धारित की गई हैं। इस वित्त वर्ष की पहली बैठक 6 से 8 अप्रैल 2026 के बीच संपन्न हुई थी, जिसके बाद आज के फैसले घोषित किए जा रहे हैं।
रेपो रेट पर क्यों रहती है नजर?
दरअसल रेपो रेट का सीधा संबंध आम लोगों द्वारा लिए जाने वाले लोन से होता है। जैसा कि पहले बताया गया है, रेपो रेट वह ब्याज दर है जिस पर आरबीआई बैंकों को लोन देता है। जब केंद्रीय बैंक रेपो रेट घटाता है, तो बैंकों को कम ब्याज पर पैसा मिलता है। इस सस्ते कर्ज का फायदा अक्सर बैंक अपने ग्राहकों को देते हुए अपनी ब्याज दरें कम कर देते हैं, जिससे लोन लेना सस्ता हो जाता है।
क्यों लिया जाता है इसे बढ़ाने या घटाने का फैसला?
वहीं भारतीय रिजर्व बैंक रेपो रेट को बढ़ाने या घटाने का फैसला क्यों लेता है, यह समझना भी महत्वपूर्ण है। किसी भी केंद्रीय बैंक के पास महंगाई से लड़ने के लिए पॉलिसी रेट एक बहुत ही शक्तिशाली और प्रभावी उपकरण होता है। जब अर्थव्यवस्था में महंगाई बहुत अधिक बढ़ जाती है, तो केंद्रीय बैंक पॉलिसी रेट यानी रेपो रेट को बढ़ा देता है। रेपो रेट बढ़ने से बैंकों को केंद्रीय बैंक से मिलने वाला कर्ज महंगा हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप, बैंक भी अपने ग्राहकों के लिए लोन महंगा कर देते हैं। लोन महंगा होने से बाजार में नकदी का प्रवाह (मनी फ्लो) कम हो जाता है। मनी फ्लो कम होने से वस्तुओं और सेवाओं की मांग में कमी आती है, और धीरे-धीरे महंगाई नियंत्रण में आ जाती है।
इसके विपरीत, जब अर्थव्यवस्था बुरे दौर से गुजर रही होती है और उसे रिकवरी की जरूरत होती है, तो केंद्रीय बैंक बाजार में नकदी का प्रवाह बढ़ाने की कोशिश करता है। ऐसे समय में, सेंट्रल बैंक पॉलिसी रेट को कम कर देता है। पॉलिसी रेट कम होने से बैंकों को केंद्रीय बैंक से मिलने वाला कर्ज सस्ता हो जाता है। इस सस्ते कर्ज का फायदा बैंक अपने ग्राहकों को देते हुए सस्ती दरों पर लोन उपलब्ध कराते हैं। सस्ती दरों पर लोन मिलने से बाजार में मनी फ्लो बढ़ता है, जिससे मांग में वृद्धि होती है और अर्थव्यवस्था को गति मिलती है, जिससे वह मंदी से उबरने में मदद मिलती है।